डायबिटीज – धर्म और पांव

by Dr. Sudhir Kumar Jain

MS, Phd Diabetic Foot Surgeon

डायबिटीज आज हर तबके, जाति, धर्म, लिंग तथा उम्र के लोगों को ग्रसित कर रही है| हम आज डायबिटीज में पांव के संक्रमण के कुछ अनछुए पहलुओं पर विचार करेंगे, जिनका संपर्क धर्म से है|

मंदिर-मस्जिद भ्रमण :- ज्यादातर लोग जब मंदिर-मस्जिद या अन्य धार्मिक स्थलों का भ्रमण करते हैं तो अपने जूते, चप्पल व मोजे उतार कर ही अंदर प्रवेश करते हैं| ऐसे में यह लोग गर्म मार्बल या जमीन पर चलते हैं| स्नायु दुर्बलता से पीड़ित डायबिटीज मरीज के पांव इस अत्यधिक गर्म का अनुभव नहीं कर पाते और मंदिर-मस्जिद की परिक्रमा करते-करते इनके पांव झुलस सकते हैं| कुछ ही घंटों के उपरांत पांव में बड़े-बड़े फफोले उभर कर आ सकते हैं, जिनको सूखने में काफी दिन लग सकते हैं|

उपाय :- डायबिटीज मरीज को हो सके तो गर्म दिनों में दिन की बजाए संध्या या रात्रि के समय का चयन करना चाहिए| उन्हें चलते वक्त चटाई-पट्टी या कालीन का उपयोग करना चाहिए| यदि संभव हो तो सूती के जुराब का इस्तेमाल करना चाहिए|

तीर्थ पद यात्रा :- जब यात्रा लंबी, पथरीले मार्ग से व दिन के समय हो और यात्री नंगे पांव हो, तो ऐसे में पांव कई तरह से चोटिल हो सकते हैं| जैसे कंकड़, पत्थर, कांटे या अन्य नुकीली वस्तुओं से या गर्म सतह के संपर्क से| ऐसे में संभल कर, पांव पर अत्यधिक जोर न देकर, हो सके तो जुराब पहनकर तथा ऐसे समय में यात्रा उस समय करें जब धूप ज्यादा न हो, तो बेहतर है|

नमाज पढ़ना :- हमारे मुस्लिम भाई नमाज पढ़ते वक्त एक विशिष्ट मुद्रा में अपने पांव पर बैठते हैं| ऐसे वक्त टखने के नजदीक अत्यधिक जोर पड़ता है और यह स्थान धीरे-धीरे कड़ा पड़ कर आयतन का रूप धारण कर लेता है| संवेदनशीलता के अभाव में यह कड़ा होकर फट जाता है| इसमें संक्रमण हो गंभीर अवस्था पैदा हो सकती है|

पद्मासन मुद्रा :- ज्यादातर पुजारी वर्ग जब पूजा करवाते हैं तो ये कड़े धरातल पर लंबे वक्त अपने पांव व घुटनों को मोड़कर (पार पैर या क्रास लेग्ड) बैठते हैं| ऐसे में टखने की एक ऊभरी हुई हड्डी पर ज्यादा जोर पड़ता है| इससे इस जगह की चमड़ी कड़ी व कठोर होकर आयतन का रूप धारण कर लेती है| बाद में घाव का रूप धारण कर संक्रमण पैदा हो सकता है| इस अवस्था को पुजारी एंकल कहा जाता है|

उपाय :- बैठते वक्त अपने पांव की अवस्था बदलते रहें और मुमकिन हो तो नरम सतह पर बैठें|

पद प्रक्षालन और मालिश :- धार्मिक मान्यता के अनुसार हमारे कुछ धर्मों में अपने गुरुवरों के पांव को दूध, (गर्म) पानी, घी आदि से धोकर आशीर्वाद लिया जाता है| यदि गुरुवर को डायबिटीज हो और यह प्रक्रिया लंबी चले या गुरुवर के पांव में कोई घाव या संक्रमण हो तो गंभीर परिणाम हो सकते हैं| ऐसे में पांव की जोरदार मालिश भी नहीं करनी चाहिए| क्योंकि इससे स्नायु, रक्तसंचार व मांसपेशी संस्थान को हानि हो सकती है तथा संक्रमण तेजी से फैल भी सकता है|

ठंड, तंग जूते व नमी :- कई बार तंग कपड़े के जूते पहने जाते हैं| भ्रमण के दौरान पांव में सूजन आ सकता है और सूजे हुए पांव को जूता काटकर घाव व संक्रमण पैदा कर सकता है| अत्यधिक ठंडे या बर्फीले माहौल भी पांव के रक्त संचार को बाधित कर गंभीर अवस्था उत्पन्न कर सकता है| पानी या पसीने की वजह से अँगुलियों के बीच की जगह में फंगस लग सकती है जो बाद में भयंकर संक्रमण की अवस्था पैदा कर सकती है|

उपाय :- जूता पंजों की तरफ से चौड़ा हो तथा जब भी खरीदा जाए शाम के वक्त खरीदना चाहिए जब पांव की सूजन सबसे अधिक रहती है| नए जूते की उपयोग अवधि धीरे-धीरे बढ़ानी चाहिए| बेहतर हो सेंडल शू जो आगे से खुला हो, का प्रयोग किया जाए| अंगुलियों के बीच की जगह सूखी रखें तथा हो सके तो पाउडर का इस्तेमाल करें| अंगुलियों के बीच की जगह में कोई सूती कपड़ा (गौज) या रूई डालकर खुली रखें| यदि लंबा चलना हो तो, पांव को बीच-बीच में विश्राम दें तथा जूते को खोलकर पांव ऊपर रखें|

डायबिटीज गुरुवर के पांव का संक्रमण :- कई धर्मों में गुरुजन दवा विशेषकर एलोपैथी का इस्तेमाल नहीं करते हैं| ऐसे में भलाई इसी में है कि पांव को साफ रखा जाए| किसी तेल (जैसे नारियल) का व्यवहार कर पांव को सूखा होकर फटने न दें | यदि संक्रमण का संदेह हो तो पांव को विश्राम दें| घाव हो जाए तो कम से कम नार्मल सेलाइन से धो दिया जाए और मुमकिन हो तो इसकी पट्टी कर ढंक दिया जाना चाहिए|

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