डायबिटीज संक्रमण और बदले-बदले से मिजाज – आखिर क्यों?

By DR. Sudhir Kumar Jain

Diabetic Foot Surgeon

‘डॉक्टर मुझे जीने की इच्छा अब नहीं रही, मेरी वजह से पारिवारिक शांति नष्ट हो रही है, मैं परिवार वालों पर बोझ हो गया हूँ, मैं अब कुछ भी करने योग्य नहीं रहा…|’

‘डॉक्टर साहब, मेरे पतिदेव (मरीज) का मिजाज बहुत बदल गया है, वे चिड़चिड़े हो गए हैं| बात-बात में हम पर गुस्सा उतारते हैं, हमारी बात नहीं सुनते, अपने स्वास्थ्य और पांव का ध्यान नहीं रखते….|’

‘पिताजी की बीमारी से तंग आ गए हैं, इनसे तो अब कुछ होता नहीं है और इनकी बिमारी पर जो खर्च हो रहा है इससे तो हम जल्द ही दिवालिया हो जाएंगे…|’

‘यदि आप (मरीज) अपने पांव का ध्यान नहीं रखेंगे तो जल्द ही इसे काट देने की नौबत आ सकती है| ये हकीकत में प्रायः संक्रमण से पीड़ित डायबिटीज मरीज के संपर्क में सुनने आते हैं| ये शत प्रतिशत सत्य संवाद है| आखिर सभी संक्रमित मरीज से परेशान क्यों? क्यों मरीज के तेवर बदल जाते हैं? आइए इन अनछुए पहलुओं की तह तक जाएं और जाने कि मरीज के बदले-बदले से मिजाज की हकीकत आखिर क्या है?

डायबिटीज एक स्थायी आजीवन बीमारी है यदि मरीज इसे काबू में रख पाए तो वह एक स्वाभाविक स्वस्थ जीवन जी सकता है| किंतु जैसे ही इसमें और समस्याएं जैसे – हृदय, गुर्दे या पांव के संक्रमण आदि आ जाती है, इसका स्वभाव बदल जाता है| इसी के साथ मरीज का स्वाभाव परिवर्तन भी होने लगता है|

अनुभव कीजिए, एक परिवार का पालन पोषण करने वाला (विशेषकर यदि अकेला हो तो) डायबिटीज रोगी यदि पांव के संक्रमण से पीड़ित हो जाए तो उसका चलना-फिरना बंद हो जाता है| वह काम करने लायक नहीं रहता, भले ही अस्थाई रूप से उसे अपने इलाज के लिए काफी व्यय करना पड़ता है| तथ्य कहते हैं कि एक डायबिटीज रोगी जो संक्रमित हो जाए तो उसे अपनी आमदनी का तीस फीसदी हिस्सा चिकित्सा में व्यय करना पड़ सकता है|

यदि परिवार में कमाने वाला अन्य व्यक्ति न हो तो मरीज को असीम चिंतामई माहौल में रहना पड़ सकता है| वह अपने आपको असहाय महसूस करने लगता है| पारिवारिक दैनिक खर्चे का बोझ उठाना उसके लिए संभव नहीं भी हो सकता है| इससे उसके स्वाभाव में बदलाव आने लगता है| कभी-कभी वह अपने आपको अपने परिवार पर एक बोझ समझ बैठता है और अंदर से टूट जाता है| कभी-कभी स्वयं को ख़त्म करने की प्रवृत्ति भी आ जाती है| वह अपने आपको नजर अंदाज करने लगता है|

एक लंबी, आजीवन बीमारी और गिरते हुए स्वास्थ्य को देख तथा खर्चीली चिकित्सा से घरवाले भी धीरे-धीरे परेशान होने लगते हैं | ऐसी परिस्थिति में घरवाले मरीज से मुंह फेरने लगते हैं | जीवन का यह कटु सत्य मैंने कई बार देखा या अनुभव किया है|अपने को पराएँ होते, मरीज को नजरंदाज करते ,दिखावटी चिंता करते, मन-मन में मरीज को जल्दी उठा लेने की ईश्वर से मिन्नत करते – मैंने अपने दो दशक से ऊपर के संक्रमण के खिलाफ जिहाद में, यह सब देखा है|

बढ़ती उम्र तथा उच्च रक्तचाप या अन्य वजह से मस्तिष्क भी कभी-कभी सही ढंग से विवेचना करने में असमर्थ हो जाता है| इससे भी बात व्यवहार में फर्क आ सकता है| डायबिटीज में गुर्दों की कार्यक्षमता जब कम हो जाती है, तब रक्त व शरीर के विषाक्त पदार्थों का विसर्जन नहीं हो पाता है| ये विषाक्त पदार्थ मस्तिष्क की कार्यक्षमता में प्रतिकूल प्रभाव डाल मानसिक संतुलन बिगाड़ सकते हैं|

तकरीबन यही स्थिति मरीज की सेप्टिक की अवस्था में भी हो सकती है, जब विषाक्त तथा अनावश्यक रासायनिक तत्व खून में पैदा होकर विभिन्न संस्थानों को प्रभावित करने लगते हैं| विभिन्न बीमारियों की वजह से खाने में बंदिश, अरुचिकर खाना, अस्पताल-ऑपरेशन थिएटर का भय और इनका गंधमय माहौल प्रायः दो दर्जन से ऊपर की औषधियां जिन्हें एक डायबिटीज मरीज प्रायः लेते रहता है, इंसूलिन और अन्य इंजेक्शनों का भय व कष्ट आदि भी मरीज की बात व्यवहार में रुष्टता ला सकते हैं|

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