डायबिटीज और हमारे पांव

दिल-दौलत-दिमाग-कौन कितना महत

By Dr. Sudhir Kumar Jain

Diabetic Foot Surgeon

आज हम बाबूजी को स्मरण करते हुए उनकी आदर्श सलाह को वर्तमान चिकित्सा विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में डायबिटीज से उपजे पांव के संक्रमण की चिकित्सा के संदर्भ में परखते हैं|

बाबूजी पर सरस्वती मेहरबान थी| उनका दिमागी ज्ञान असीमित था| उनका दिल महान तथा मानवीय गुणों का पिटारा था| वे लक्ष्मी के पीछे कभी नहीं भागे, किंतु परिवार के हर सदस्य को कभी भी कोई कमी नहीं होने दी| हर सदस्य को स्वावलंबी बनाया, मनुष्य होना सिखाया तथा दिल, दिमाग और दौलत का सही इस्तेमाल करना सिखाया| मैं बाबूजी का आभारी हूँ| उन्ही की सलाह को चिकित्सा विज्ञान में भी इस्तेमाल कर रहा हूँ| आज जो भी थोड़ी बहुत उपलब्धि हासिल कर पाया हूँ, उन्ही की बदौलत है|

डायबिटीज में पांव के संक्रमण के इलाज में दिल-दिमाग और दौलत – इन तीनों का इस्तेमाल किया जाता है| कब, किसका, कितना, किस क्रम में इस्तेमाल हो, जिससे की मरीज आरोग्य हो – यह जानना अत्यंत जरुरी है| आइए इन्हीं तीन अनछुए पहलुओं का जिक्र हम चिकित्सक तथा मरीज/मरीज के संबंधियों के परिप्रेक्ष्य में करें|

  1. दिमाग और चिकित्सक : इसमें कोई संदेह नहीं कि एक चिकित्सक को दिमाग से काम लेना चाहिए| बीमारी के सही निदान में चिकित्सा विज्ञानं को जानना बहुत जरुरी है| चिकित्सा के दौरान भी दिमागी ज्ञान को व्यवहारिक ज्ञान में तब्दील कर मरीज को आरोग्य किया जाता है| पर क्या पांव के संक्रमण/सेप्टिक में सिर्फ दिमाग का ही काम लेना चाहिए? जैसा कि हम जानते हैं कि डायबिटीज संक्रमण में कोई भी भविष्यवाणी सौ प्रतिशत दावे के साथ नहीं की जा सकती है| सुधरा हुआ खेल बिगड़ सकता है और कभी-कभी बिगड़ा हुआ खेल भी सुधर सकता है| दिमागी-किताबी ज्ञान और वास्तविकता में कई बार कोई सामंजस्यता नजर नहीं आती| सिर्फ दिमागी ज्ञान के इस्तेमाल से कई दफे चिकित्सा लंबी, खर्चीली और निष्फल हो सकती है| जब दिल कुछ और कहे और दिमाग कुछ और सोचे, तो शायद सिल की ही सुननी चाहिए| यह मैंने कई बार संक्रमण का इलाज करते हुए महसूस किया है|
  2. 2. दिल और चिकित्सक : पांव के संक्रमण के इलाज में दिल से दिमागी ज्ञान का इस्तेमाल करना चाहिए| यंत्रवत एक ही दिमागी ज्ञान हर मरीज में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है| मरीज और उसके परिवार की अवस्था को मद्देनजर रखते हुए चिकित्सक को अपने दिल का उपयोग मानवीय तरीके से करना चाहिए| चिकित्सा ज्ञान को परिस्थितिनुसार ढालने की कला में चिकित्सक को निपुण होना चाहिए| मरीज एक हाड़-मांस का मानव है न कि एक निर्जीव मशीन| इसका कोई भी हिस्सा/संस्थान डायबिटीज से प्रभावित हो सकता है| ऐसे मरीज डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं| यदि सदैव इन पर इनकी स्थिति के लिए दोषारोपण करें तो इनमें आत्मग्लानी आ जाती है| इनका आत्मसम्मान चोटिल हो जाता है| यह अपने आपको दोषी मानकर खाना-पीना कमा सकते हैं | स्वयं को ध्वंस करने की प्रवृत्ति आ सकती है| चिकित्सक को मरीज का संबल बनाए रखना चाहिए| उनमें आत्मविश्वास जगाए रखने के लिए चिकित्सक को अपने दिल से काम लेना चाहिए| मरीज की जगह स्वतः को रखते हुए हर वाक्य को बोलते वक्त या राय देते वक्त कम से कम दो बार सोचना चाहिए| मरीज के हित के लिए कई बार दिमाग के आगे दिल की सुननी चाहिए| मरीज के दिल के साथ चिकित्सक को अपने दिल की धड़कनों का तालमेल रखना चाहिए|
  3. दौलत और चिकित्सक : चिकित्सक में धनलोलुपता नहीं होनी चाहिए, खासकर यदि वह डायबिटीज या इससे उपजे संक्रमण का इलाज करता हो| डायबिटीज हर तबके गरीब व धनी किसी को भी हो सकती है| इसकी चिकित्सा काफी खर्चीली होती है| कई संस्थानों को जैसे – ह्रदय, गुर्दा, मस्तिष्क आदि को प्रभावित करने की वजह से कई प्रकार के इलाज चलते रहते हैं| यह खर्चीली चिकित्सा लंबी या आजीवन चलती रहती है| कोई भी मरीज धन के अभाव में चिकित्सा से वंचित न हो तो बेहतर| इलाज को मरीज की क्षमतानुसार ढालने की कला चिकित्सक को आनी चाहिए| बेवजह जांच-पड़ताल या दामी दवाइयों का दुरूपयोग भी नहीं होना चाहिए| ईश्वर को साक्षी मानकर दिल लगाकर दिमाग का उपयोग करें, लक्ष्मी स्वतः आएगी| एक पांव को बचाकर मरीज को नई जिंदगी देने का मूल्यांकन सिर्फ पैसों से करना उचित नहीं है| अनजाने में मरीज या उसके परिवार की आजीवन दुआ जो चिकित्सक को स्वतः मिलती है वह लाखों की फीस से भी ज्यादा मूल्यवान होती है|
  4. दिमाग और रोगी/संबंधी : रोगी और उसके संबंधियों को अपना दिमाग चौकन्ना और दुरुस्त रखना चाहिए| कभी भी संक्रमण का संदेह हो तो तुरंत योग्य चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए| स्नायु दुर्बलता से डायबिटीज मरीज को अपने पांव में संक्रमण का अहसास नहीं भी हो सकता है| संबंधी यदि दिमागी हो तो वह भी मरीज की दशा समझ सकता है और चिकित्सा-विलंब को रोक सकता है| योग्य चिकित्सक की सलाह को बखूबी दिमाग लगाकर प्रयोग में लाना चाहिए| यह भी स्मरण रहे कि ‘अल्पज्ञान विनाशे कारण’ – यानि डॉक्टरी ज्ञान न होते हुए भी, अगल-बगल की सुनकर या इंटरनेट में अधकचरा ज्ञान लेकर मरीज की चिकित्सा करना अपराध है| अंधविश्वास को कभी भी दिमाग में आने देना नहीं चाहिए| इन सबसे सु-चिकित्सा में विलंब होता है और मरीज की जान खतरे में पड़ सकती है|
  5. दिल और मरीज/संबंधी : मरीज को दिल का मजबूत होना चाहिए| दिल कमजोर हो तो ऋणात्मक भावनाएं पनपने लगती है और चिकित्सा का सुफल नहीं मिलता| संबंधियों का दिल भी मरीज के दिल के साथ धड़कना चाहिए| समय-समय पर प्रोत्साहन देते रहना चाहिए| मरीज की जो भी सेवा-भाव की जाए वह सच्चे दिल से की जानी चाहिए| चिकित्सक की सलाह का सही ढंग से पालन करने हेतु मरीज की हर स्तर पर दिल-दिमाग से सहायता करनी चाहिए|
  6. दौलत और मरीज/संबंधी : डायबिटीज किसी के साथ भेदभाव नहीं करती, गरीब-धनी सभी को प्रभावित कर सकती है| दौलत कमाने की होड़ में आज मानव इतना अंधा हो गया है कि वह अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं रख पाता है| डायबिटीज रोगी अपने शरीर व खासकर पांव का ध्यान नहीं रखता| संक्रमण से प्रभावित पांव को काटने की स्थिति में लाने की वजह कई बार संक्रमित पांव को लेकर दौलत कमाने की दौड़ में सम्मिलित होना भी होता है| पांव की देख-र%
%d bloggers like this: