असम NRC: हिन्दी भाषी कैसे हो गए विदेशी, जनता परेशान, नेता हैरान

असम में एक हिंदी भाषी दम्पत्ती को विदेशी नागरिक बता कर डिटेनशन कैम्प में डालने के बाद असम में रहने वाले हिंदी भाषी परेशान हैं और उन के नेता हैरान. 


गुवाहाटी

असम के तिनसुकिया में हिन्दीभाषी दिनेश प्रजापती और उन की पत्नी तारा देवी को विदेशी नागरिक बता कर डिटेनशन कैम्प में डाल देने का मामला अब तूल पकड़ने लगा है. इस घटना  का अखबारों में सुर्खियाँ बन्ने के बाद जहां एक और असम में रहने वाले हिंदी भाषी परेशान हैं वहीं नेता हैरान हैं.

याद दिला दें कि असम के तिनसुकिया में रहने वाले दिनेश प्रजापती और उन की पत्नी तारा देवी को तीन महीन पहले विदेशी बता कर डिटेनशन कैम्प में डाल दिया गया. उन डॉन का नाम भी NRC में नहीं आया . इस सदमे को सहन न कर सकी दिनेस की 70 वर्षीय बूढ़ी माँ 15 अगस्त को दम तोड़ दिया. अब दिनेश के पांच बच्चे बेसहारा गाँव वालों के पास हैं.

इस घटना को भाजपा विधायक और हिन्दीभाषी समन्वय समित्ती के अध्यक्ष अशोकानंद सिंघल ने भी दिनेश प्रजापति और उन की पत्नी को विदेशी बताना और डिटेनशन कैम्प में डाल देने के मामले को अमानवीय करार दिया है. NESamachar से बात चीत के दौरान उन्हों ने कहा कि विदेशियों की पहचान के लिए  NRC एक सही प्रक्रिया ज़रूर है लेकिन NRC के नाम पर भारतीय नागरिक या हिंदी भाषी यदी परेशान होते हैं तो NRC पर प्रश्न चिन्ह लगना लाजमी है. उन्हों ने कहा असम इस वक़्त कठिन समय से गुज़र रहा है इस लिए हर किसी को राजनीती से ऊपर उठ कर देश के लिए सोचना ज़रूरी है.

उधर भाजपा प्रवक्ता प्रमोद स्वामी ने आरोप लगाया है कि दरअसल हिंदी भाषियों को विदेशी बता कर NRC प्रक्रिया को बाधित करने की साज़िश रची जा रही है. सरकार को इस पूरे घटनाक्रम की गहराई से जांचक करनी चाहिए और आरोप के खिलाफ सख्त कारवाई करनी चाहिए.

दिनेश प्रजापती का मामला सुर्ख़ियों में आने के बाद हिंदी भाषियों को विदेशी बताने के और भी मामले सामने आने लगे हैं. इन्हीं मामलों में एक मामला गुवाहाटी के लाल बाबू पासवान का भी है. बिहार के पूर्वी चम्पारण से तीन दशक पहले रोटी के तलाश में आये लाल बाबू को भी विदेशी न्यायधिकरण ( foreigner’s tribunal ) की ओर से नोटिस मिला है और उन्हें विदेशी बताया गया है .

बहर हाल दिनेश प्रजापती की घटना के बाद असम में रहने वाले हिंदी भाषी डरे-सहमे और परेशानसे हैं. उन्हें यह आशंका सताने लगी है कि पता नहीं कब उन्हें विदेशी बना दिया जाए और अपने ही देश में नागरिकता सिद्ध करने की नौबत आ जाए.

परेशान हिन्दीभाषी अपने नेताओं के पास फ़रियाद ले कर पहुँच रहे हैं  लेकिन नेताओं के पास भी उन के फ़रियाद सुनने के आलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं है. वह उन की शिकायत केन्द्रीय नेताओं तक हुंचा रहे हैं. एक प्रकार से वह भी बेबस ही नज़र आ रहे हैं.

 

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