असम एनआरसी: जनता शांत, नेता परेशान

गुवाहाटी

By Manzar Alam, Founder Editor, NESamachar, Former Bureau Chief ( Northeast ), Zee News 

असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न ( एनआरसी ) NRC का पहला मसौदा जारी होने के बाद जहां जनता शांत है वहीं नेता परेशान हैं. एनआरसी की सूची जारे होने से पहले, असम में क़ानून व्यवस्था बिगड़ने को ले कर जितना अंदेशा लगाया जा रहा था, उतना कुछ भी नहीं हुआ  क्योंकि आम जनता को एनआरसी का मतलब और उद्देश्य समझाने में सरकार सफल रही है. वहीं जनता को यह भी समझ में आ गया कि अगर पहली सूची में नाम नहीं है तो इस का मतलब यह हरगिज़ नहीं है की वह भारत का नागरिक नहीं है.

असम के मुख्य मंत्री सर्वानंद सोनोवाल बार बार यह कह रहे हैं कि जो भारतीय नागरिक हैं उन्हें अपना नाम एनआरसी में शामिल करवाने का पर्याप्त अवसर मिलेगा. मुख्य मंत्री के इस ब्यान से भी जनता को काफी हद तक संतुष्टी मिली है.

लेकिन मजेदार बात यह है कि एनआरसी की पहली सूची जारी होने के बाद जहां असम की जनता शांत है वहीं नेता परेशान नज़र आ रहे हैं. और बिना सोचे समझे उल्टी सीधी ब्यान बाज़ी करने से नहीं चूक रहे हैं.  ऐसे नेताओं में सब से ऊपर नाम है बंगाल के मुख्य मंत्री ममता बनर्जी का जिन्हों ने एनआरसी को न केवल बंगालियों को असम से निकालने का साज़िश बताया बल्की केंद्र सरकार को चेतावनी भी दे डाली.

दरअसल यह नेता चाहे वह किसी भी पार्टी के हों,  वह राजनीति की रोटी सेकने का कोई भी अवसर हाथ से जाने नहीं देना चाहते हैं. न तो उन्हें जनता से कोई सरोकार होता है और न ही वह जनता के हितों के बारे में सोचते हैं तो देश के हित के बारे में सोचना उन के लिए तो दूर की बात है.

एनआरसी की गूँज असम की सड़कों पर नहीं गूंजी लेकिन संसद में ज़रूर गूंजी. ज़ाहिर है असम की जनता ने एनआरसी का खुले दिल से स्वागत किया है लेकिन नेताओं की परेशानी साफ़ नज़र आ रही है, अगर ऐसा नहीं होता तो तृणमूल कांग्रेस के नेता शीतकालीन सत्र के दौरान  संसद के बाहर प्रदर्शन नहीं करते.

एनआरसी की पहली सूची में 1.9 करोड़ लोगों के नाम हैं. शेष 1.39 करोड़ लोगों के नाम शामिल नहीं होने से राज्य में सियासी विवाद खड़ा हो गया है. लेकिन गौर करने वाली बात यह है की सिविल विवाद नहीं खडा हुआ है. राज्य के किसी भी कोने से नागरिकों द्वारा किसी अन्य नागरिक या परिवार को विदेशी करार दिए जाने की कोई खबर नहीं आयी है. कहीं से यह भी खबर नहीं आयी के किसी परिवार का नाम एनआरसी में नहीं होने के कारण उस के साथ किसी ने दुर्वव्यवहार किया हो.

सब कुछ शांत है, राज्य में अमन और शांती है, फिर नेताओं में बेचैनी और परेशानी क्यों ? कल तक असम में रह रहा हर अल्पसंख्यक डरा और सहमा हुआ रहता था. मालूम नहीं कब और कौन उसे विदेशी कह डाले. लेकिन आज डर और खौफ के उस माहौल से वह बाहर आ चुका है. डरे वह जो विदेशी है. जो जायज़ भारतीय नागरिक हैं, उन्हें डर कैसा. यह एनआरसी ही तो है जो उन्हें इस डर और खौफ के माहौल से निजात दिलवाया है. फिर इस का विरोध क्यों.

ज़रुरत है उन नेताओं को जनता से सीख लेने की और बजाए बेकार की और भड़काऊ ब्यान बाज़ी करने की वह समय की ज़रूरत को समझें न कि राजनीती के रोटी सेकें.

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