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‘‘मई दिवस’’ पर विशेष

‘‘मई दिवस’’

By-  Wamik Parwez

आज मई दिवस मजदूरों, कामगारों के हितों, इनकी सुरक्षा तथा इनकी सामाजिक और आर्थिक उपलब्धियों का एक अंतराष्ट्रीय महोत्सव बन गया है, लेकिन आज से वर्षो पहले इन पर ढाये गये जु़ल्म, आर्थिक-सामाजिक, मानसिक, शारीरिक शोषण के साथ-साथ पारिवारिक शोषण के विषय में जानेंगे तो आपकी अन्र्तरात्मा चितकार उठेगी। हम सब अच्छी तरह जानते है कि कोई भी बड़ा आन्दोलन, विद्रोह, संकल्प यकायक खतरनाक, विनाशकारी, उग्र रूप धारण नही कर लेता, अगर आप ध्यान दें, तो पायेंगे की दुनिया भर में जितने भी छोटे-बड़े आन्दोलन हुये है, उनमें अधिकतर के पीछे एक छोटी सी घटना ने ही एक बड़े आन्दोलन को जन्म दिया है, बहुत बार इस छोटी सी घटना पर लोगों का ध्यान आन्दोलनों के समाप्ति पर कारणों की खोज-बीन करने पर पता चला कि असल शुरूआती वजह क्या थी ? किसी भी बड़े आन्दोलन की पृष्ठभूमि भी धीरे-धीरे तैयार होती है और इस आग को उग्र और व्यापक रूप देने में ऐसे अज्ञानी होते है, जिनका ‘‘मैं’’ बहुत बड़ा होता है, वह अपने एवं अपने परिवार के हित एवं स्वार्थ को सबसे और सबके आगे रखते हुए इस जीवन को जीते है। इनके अपने अहम्, ईगो, धन, मान-सम्मान के आगे इन सारी मूल्य-मान्यताओं की कोई अहमियत नही होती।

इसी प्रकार जब ष्डंल क्ंलष् (मई दिवस) मजदूरों, कामगारों के उत्सव के रूप में क्यों मनाना शुरू किया गया कि पृष्ठभूमि में झांकने की कोशिश करने पर वह तस्वीरें सामने आई, जिसे देखकर दिल दहल जाता है, इतिहास गवाह है कि मानवों पर कुछ मानवों के द्वारा हमेशा से ही घृणित, जानवरों से भी बदतर अत्याचार करने का इतिहास और उससे मुक्ति पाने का भी इतिहास रहा है। जैसे मशीनी युग का उदय हुआ। प्दकनेजतपंसप्रंजपवद की शुरूआत हुई, उसी समय इसका बीज भी पड़ चुका था, पर अंकुरित होने के लिए भी इसे प्रतिकूल हालात की आवश्यकता थी, जो समय के साथ-साथ औद्योगीकरण का ग्रोथ, फैलाव और छोटे-बड़े कल-कारखानों की बढ़ती संख्या ने यंत्रों के साथ-साथ डिमांड के अनुसार उत्पादों की बाजारों में मांग के अनुसार पूर्ति के लिए कामगारों, लेबरों की आवश्यकता भी बहुत बढ़ गई और यंत्रों की भांति कामगारों को भी रात-दिन बिना रूके, उनके श्रम की आवश्यकता पड़ने लगी। कैपिटलिस्ट, फैक्ट्री मालिकान तो चाहता था कि कामगार रात-दिन बिना थके यंत्र की ही भांति, बिना खाये-पिये, बिना सोये काम में लगा रहे, अपना पसीना बहता रहे और वह बहुत वर्षो तक ऐसा करता रहा, सहता रहा। मालिकान सुविधा के नाम पर कुछ देना ही नही चाहता था, समय-समय पर कामगारों द्वारा कुछ सुविधा की मांग उठती रहती थी, पर कैपिटलिस्ट हर मांग को ठुकराता रहा। कुछ की सोच ऐसी थी कि मजदूर वर्ग उसके मुनाफे को कम करना चाहता है, उनके लाभ को छीनना चाहता है, वह हर डिमांड, मंाग को च्तवपिज – स्वे के चश्में से देखता था, 18 से 20 घंटे काम करना उस समय आम था। कैपिटलिस्टों के पास उस समय नैतिकता नाम की कोई चीज नही होती थी, अधिकतर ऐसे ही थे।

कल कारखानों में कामगारों के लिए सुविधा न के बराबर होती थी, स्वास्थ्य के प्रति उद्योगपतियों को कोई चिंता नही रहती थी, कामगारों में फेफड़ों की बीमारी आम बात थी। फैक्ट्री का वातावरण बेहद दूषित एवं असुरक्षित था, आये दिन दुर्घटनाएं होती रहती थी, इससे मौतें अक्सर हो जाती या फिर कामगार दिव्याॅग बनकर घर बैठ जाने को मजबूर होते। प्रबंधकों और मालिकान को ऐसे कामगारों की आवश्यकता नही रहती, ज्यादातर कामगार नौकरी के 5-10 वर्षो बाद ही बीमार और बूढ़े दिखने लगते और इनके घरों की हालत भी पैसों की कमी और 18-20 घंटों की ड्यूटी के बाद घर के लिए समय कहां बचता था। ऐसी घटनाओं से प्रेरित होकर ही महान चार्ली चैपलिन ने मार्डन टाईम फिल्म बना डाली थी। ऐसे खराब वातावरण के कारण हर वर्ष हजारों कामगार, मर्द, औरतें, बच्चे मर जाते, कोई मेडिकल, कम्पनसेशन कुछ भी नही दिया जाता। कोई मालिक यदि अपनी जेब से कुछ रूपये दे देता तो वह बहुत उदार व्यक्तित्व का मालिक माना जाता था। दूसरी तरफ इन कामगारों के रात-दिन किये गये श्रम और बहाये गये पसीने से पैदा कमाई पर कैपिटलिस्ट फैक्ट्री के बाॅस, मालिकान, प्रोडक्ट उत्पाद सप्लायर, डिस्ट्रीब्यूटर और सेवा देने वाले लोग खूब माला-माल हो रहे थे, इनके साथ ही साथ कामगारों पर तैनात सुपरवाइजर और बड़े अधिकारियों जो रात-दिन इन कामगारों पर रौब और सख्ती कर प्रोडक्शन बढ़ाने का दबाव डाल कर मालिकान को खुशी दिया करते थे, उनकी तिजोरियों को भरा करते थे उनकी भी मौज रहती थी। किसी ने उस समय के कामगारों के हालात को देखते हुए लिखा था, कि इनकी स्थिति फिरौन (इजिप्शियन किंग) के शासन काल के गुलामों में कुछ भी अन्तर नही है।

सन् 1850 आते-आते 18-20 घंटे कठोर श्रम एवं फैक्ट्रियों में कुछ घटनाओं एवं दुर्घटना से कामगारों में रोष पैदा होना शुरू हो गया था, विरोध कड़े होने लगे थे, ऊपर से मालिकानों की उपेक्षा, विभेद क्पेबतपउपदंजपवद और नकारात्मक रवैये ;छमहंजपअम ।जजपजनकमद्ध भी बड़ा कारण बना। धीरे-धीरे ही सही असंगठित कामगारों को समझ में आने लगा कि उनके कठोर श्रम का सीधा लाभ कौन उठा रहा, कुछ एक विशेष प्रदर्शन भी हो जाया करते थे, पर इसका बहुत व्यापक असर नही दिखता, कुछ मजदूरों को प्रबंधन मिलाकर काम में लगा लेता, बाकी भी दो-चार दिनों में काम पर वापस आ जाते, उनमें ‘‘एका’’ ;न्दपजलद्ध नाम की चीज का अभाव था।

पर अगस्त-20, 1866 आते-आते ठंसजपउवतम शहर में छंजपवदंस स्ंइवनत न्दपवद का गठन कर लिया गया। डणैलसअपे को नेता चुना गया और 1866 के फाउंडिंग कन्वेन्शन ;थ्वनदकपदह ब्वदअमदजपवदद्ध में कुछ महत्वपूर्ण निर्णय भी लिये गये। जैसे –

सर्वप्रथम कामगारों को कैपिटलिस्ट ;ब्ंचपजंसपेजद्ध के चंगुल ;ळतपचद्ध से आजाद कराना।

दूसरे अमेरिका के राज्यों में आठ घंटा प्रतिदिन कार्यदिवस लागू करना।

मजदूरों एवं संगठन में एकजुटता के साथ मुख्यधारा में बनाये रखना बड़ा उद्देश्य था।

कामगारों में संगठन के प्रति, अपने अधिकार के प्रति एवं समाज में जागरूकता पैदा करना भी बड़ा उद्देश्य था।

यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि अमेरिका के 8वें प्रेसिडेन्ट डंतजपद टंद ठनतमद अपने कार्यकाल (04 मार्च 1837 से 1841) के दौरान 10 घंटे प्रतिदिन कार्यदिवस को स्वीकृत कर दिया था, पर यह गर्वनमेंट संस्थानों पर ही लागू था और बहुत प्रभावी नही था। दूसरे मालिकानों के उद्देश्य, कम से कम वेजेज़ पर अधिक से अधिक घंटो का कार्यदिवस लाभ का मूल मंत्र था, के भी विपरीत था। समय-समय पर वेजेज़ बढाने की मांग उठती रहती थी, पर उन सबके लिए और यूनियन के लिए भी 8 घंटे का कार्यदिवस की मांग महत्वपूर्ण थी। हालांकि कम दिहाड़ी के कारण उनके परिवार का गुजारा नही हो पा रहा था, इसका असर उनके परिवार की औरतों-बच्चों और बुजुर्गों की सेहत बहुत खराब हो गई थी, घर की जरूरतें पूरी नही हो पाने से व्यवस्था जर्जर हो चुकी थी, ऊपर से घरों के गार्जियन के कल कारखानों में ष्ैनद तपेम जव ैनद ेमजष् व्यवस्था ही जिम्मेदार थी। इस स्थिति, भीषण शोषण, विभेद ने व्यवस्था के विरूद्ध हर तरफ 8 घंटे के काम की डिमांड जोर पकड़ने लगी, अब स्ट्राइक ;ैजतपामेद्धए घेराव, तालाबंदी ;स्वबावनजद्ध का ज़ोर बढ़ता गया। कैपलिस्ट ने दमन का रास्ता अपनाना शुरू किया, नतीजा सन् 1885 और शुरूआती 1886 हर प्रकार का मजदूर विंग, ब्लैक स्मिथ, कारपेन्टर्स, मैकेनिक्स, फायर मैन, ब्रायलर मैन, सेमी स्किल, मैकेनिक और चैकीदार ऐसे लोग भी हड़ताल और तालाबंदी में शामिल होने लगे। यह यूनियन के लिए शुभ संकेत था तथा मालिकान के लिए उनके बुरे दिन आने का लक्षण एक आंकड़े के मुताबिक सन् 1885 तक जहां प्रदर्शनों, धरनों, तालाबंदी की संख्या – 500 बार हुई, 2467 प्रतिष्ठान और 150 लाख वर्कर शामिल हुए। वहीं सन् 1886 को शुरूआती कुछ महीनों में ये संख्या – 700 बार से ऊपर लाॅक आॅउट, घेराव हुआ और 11562 प्रतिष्ठान शामिल हुए साथ ही मजदूरों के भागीदारी 6.7 लाख के ऊपर होने लगी। वैसे तो हड़ताल का केन्द्र बिन्दु शिकागो था पर अब पूरे यू0के0 का हर शहर/टाउन घेरे में आ गया। जैसे – बाल्टीमोर ;ठंसजपउवतमद्ध, न्यूयार्क ; छमूलंताद्ध,वाशिंगटन; पदहजवदद्धए सिनसिनाटी ;ब्पदबपददंजपद्धए मिलवंकी ;डपसूंदाममद्धए डेटराईट ;क्मजतवपजद्ध इत्यादि। जब इसमें अनआरगनाइज्ड वर्कर/सेक्टर के लोग बड़े पैमाने पर शामिल होने के कारण उद्यमी एवं उद्योग जगत को हिलाकर रख दिया। मजदूरों, कामगारों में उत्साह दौड़ने लगा, उनके ‘‘अच्छे दिन’’ आने के दिन करीब दिखने लगे, आशा की एक किरण दिखी जब उनका परिवार सुखमय जीवन जी पायेगा। वह कैपलिस्ट  के चंगुल से आजाद हो जायेंगे, पर इन्हें यह नही पता था कि आजादी कुर्बानी ैबंतपपिमे मांगती है, बलिदान दिये बिना बड़ा मकसद हासिल नही होता है।

हांलाकि सन् 1884 में ही फेडरेशन ने एक मीटिंग किया, जिसे बाद में अमेरिकन फेडरेेशन आॅफ लेबर ;।उमतपबंद थ्मकमतंजपवद व स्ंइवनतद्ध के नाम से जाना जाने लगा।

लेबर यूनियन ने अब तय कर घोषणा कर दी कि 01 मई-1886 से अब 8 घंटे प्रतिदिन ही वर्कर मानेंगे और काम करेंगे। पूरे अमेरिका में इस का व्यापक असर हुआ और हड़तालें जोर पकड गई, जिसमें हर वर्ग का मजदूर, कारीगर, व्यापारी और यहां तक की अप्रवासी भी शामिल हो गये, जिनकी संख्या बहुत थी।

01 मई के बाद हर दिन लाॅकआउट, बंदी जोर पकड़ गई, लेकिन 03 मई-1886 के दिन मैककर्मिक हरवेस्टिंग मशीन ;डंबबवतउपबा भ्ंतअमेजपदह डंबीपदम ब्वउचंदलद्ध  के हड़ताली कर्मियों को तितर-बितर करने के दौरान पुसिल बलों द्वारा गोली चलाये जाने से 04 कामगारों के मारे जाने जैसी हृदय विदारक घटनाक्रम ने आग में घी का काम किया। कामगारों के अन्दर भीषण रोष पैदा हो गया। इस घटना का यूनियन ने दूसरे दिन 4 मई-1886 को हे मार्केेट स्क्वायर ;भ्ंल डंतामज नंतमद्ध शिकागों में इकट्ठा होकर विरोध प्रदर्शन करने का निर्णय लिया। प्रर्दशन में विभिन्न नेताओं ने कामगारों को सम्बोधित किया गया, जिसमें अगस्त स्पाइस ;।नहनेज ैचपमेद्धए अलवर्ट पारसन ;।सइमतज चंतेवदेद्ध और सैमूल फील्डन ;उनमस थ्पमसकमदद्ध सर्वोपरि थे। इस घटना के गवाह बने उस वक्त के शिकागो के मेयर कार्टेर हैरिसन सी0 ;ब्ंतजमत भ्ंततपेवद ैतण्द्ध पर ऐसा कहा जाता है कि मेयर मीटिंग शांतिपूर्वक खत्म होने के कगार पर थी, सब शांत था, वह वहां से चले गये।

विरोध प्रदर्शन खत्म हुआ कि पुलिस बल ने सबको हे-मार्केट से हटाना शुरू किया, तभी प्रदर्शनकारियों में से किसी अज्ञात व्यक्ति ने पुलिस पर बम फेक दिया, जिसके फलस्वरूप दंगा भड़क गया, जिसमें कम से कम 07 पुलिसकर्मी सहित एक दर्जन लोगों की जानें गई, कम से कम 40 लोग घायल हुये, बहुत सारे लोग गिरफ्तार किये गये, जिनमें खासतौर पर अलवर्ट पारसन ;।सइमतज चंतेवदेद्धए अगस्त स्पाइस ;।नहनेज ैचपमेद्धए सैमूल फील्डन उनमस थ्पमसकमदद्धए आसकर नीबो ;व्ेबंत छममइवद्धए माइकेल शोएब ;डपबींस ैबीवंइद्धए जार्ज एंजेल ;ळमवतहम म्दहमससद्धए अडोलफ आइकर ;।कवस म्पबीमतद्धए लुईस लिंग ;स्वनपे स्पदहहद्ध इनमें केवल तीन ही लोग वहां उपस्थित थे। दिनांक 11, 1887 में पारसन, स्पाइस, फिशर और एंजिल को खुले आम फांसी पर लटका दिया गया, जबकि आज तक यह पता नही चल पाया कि उस मीटिंग में बम किसने फेंका था।

इस तरह हे-मार्केट की घटना दुनिया के सारे देशों के कामगारों को एकजुट करने का कारण बना। आन्दोलनों ने बहुत सारी कुर्बानियां ली, तब जाकर कामयाब हुआ और इस तरह 1 मई दुनिया में बहुत सारे देशों के कामगार या मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

जहां तक भारतवर्ष में मई दिवस की शुरूआत साउथ चेन्नई में मैरियना बीच पर 1923 में मनाया गया। ऐसा कहा जाता है कि सिंगार वेलू चेटियार जो कि एक कम्युनिस्ट नेता ने सुझाव दिया कि जब सारी दुनिया मजदूर दिवस मनाती है तो भारत में भी इसे मनाना चाहिए और चेन्नई की एक किसान पार्टी ने आरगनाइज्ड किया था। बाद में यही नेता  डंसंलंचनतंउ पदहंतंअमसन ब्ीमजजपंत फाउंडर बने कम्युनिस्ट पार्टी के।

 

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