मणिपुर और केरल ने बदला भारतीय फुटबॉल का मॉडल, ग्रासरूट सिस्टम से तैयार हो रहे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी
मणिपुर और केरल ने ग्रासरूट स्तर पर प्रशिक्षित कोच, आयु वर्ग की लीग और राष्ट्रीय स्काउटिंग नेटवर्क के जरिए ऐसा फुटबॉल इकोसिस्टम तैयार किया है, जिससे भारतीय खिलाड़ी अब सीधे अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच रहे हैं।

भारतीय फुटबॉल Indian Football में बदलाव की सबसे बड़ी कहानी अब सिर्फ प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की नहीं, बल्कि उस मजबूत व्यवस्था की है जो उन्हें बचपन से तैयार कर रही है। मणिपुर Manipur और केरल Kerala इस बदलाव के सबसे बड़े उदाहरण बनकर उभरे हैं, जहां ग्रासरूट स्तर पर विकसित किए गए मॉडल अब खिलाड़ियों को राष्ट्रीय टीम से लेकर यूरोप के प्रतिष्ठित टूर्नामेंटों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
मणिपुर को लंबे समय से भारतीय फुटबॉल की नर्सरी माना जाता रहा है। ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (AIFF) के रिकॉर्ड बताते हैं कि राज्य ने सीनियर नेशनल फुटबॉल चैंपियनशिप, सब-जूनियर राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं और महिला आयु वर्ग की प्रतियोगिताओं में लगातार सफलता हासिल की है। हालांकि, हाल के वर्षों में सबसे बड़ा बदलाव कोचिंग व्यवस्था में देखने को मिला है।
ऑल मणिपुर फुटबॉल एसोसिएशन ने अध्यक्ष रतन सिंह के नेतृत्व में पिछले 12 महीनों के दौरान राज्य के सभी 25 जिलों में 30 से अधिक AIFF ‘E’ और ‘D’ सर्टिफिकेट कोर्स आयोजित किए हैं। इनका लक्ष्य 700 से अधिक स्थानीय कोच तैयार करना है। पूर्व भारतीय फुटबॉलर गौरामांगी सिंह जैसे प्रशिक्षक स्थानीय मणिपुरी भाषा में भी कोचिंग दे रहे हैं। इसका परिणाम यह है कि अब दूरदराज़ के जिलों में रहने वाले बच्चों को भी शुरुआती स्तर पर वही प्रशिक्षण मिल रहा है, जो इंफाल जैसे बड़े केंद्रों में उपलब्ध है।
इस मॉडल का असर भारतीय फुटबॉल में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। भारतीय महिला फुटबॉल टीम में बड़ी संख्या में खिलाड़ी मणिपुर से आते हैं। वहीं, मिनर्वा अकादमी की अंडर-14 और अंडर-15 टीम, जिसने हाल ही में स्वीडन का गोथिया कप, डेनमार्क का डाना कप और नॉर्वे कप जीता, उसमें भी मणिपुर के कई खिलाड़ी शामिल थे। टीम ने यूरोप में खेले गए 26 अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में एक भी मैच नहीं गंवाया, 295 गोल किए और गोथिया कप के फाइनल में अर्जेंटीना के एस्कुएला डे फुटबॉल 18 टुकुमान को 4-0 से हराया। टीम के खिलाड़ियों कोंथौजाम योहेनबा सिंह और हुइद्रोम टोनी को सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार भी मिला।
दूसरी ओर, केरल ने ग्रासरूट फुटबॉल के लिए अलग लेकिन प्रभावी मॉडल अपनाया है। केरल फुटबॉल एसोसिएशन ने 2017-18 से आयु वर्ग की प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाली सभी अकादमियों के लिए प्रशिक्षित कोच अनिवार्य कर दिए। यानी किसी भी टीम को प्रतियोगिता में उतारने के लिए उसके कोच के पास AIFF का मान्यता प्राप्त प्रमाणपत्र होना जरूरी है। इस व्यवस्था ने राज्य में कोचिंग की गुणवत्ता को बेहतर बनाया है।
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केरल की मजबूत फुटबॉल संस्कृति, स्थानीय क्लबों और आयु वर्ग की लीगों ने इस मॉडल को और मजबूती दी है। परिणामस्वरूप राज्य के छोटे-छोटे गांवों तक बच्चों के लिए नियमित प्रतियोगिताओं और प्रशिक्षण की व्यवस्था विकसित हो चुकी है।
इन दोनों राज्यों के प्रयासों को राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ने का काम AIFF का ब्लू कब्स कार्यक्रम कर रहा है। विज़न 2047 के तहत इस पहल का लक्ष्य 2026 तक 4 से 12 वर्ष की आयु के 3.5 करोड़ बच्चों को फुटबॉल से जोड़ना है। इसके साथ ही 2018 से AIFF राज्य फुटबॉल संघों के सहयोग से नियमित स्काउटिंग अभियान भी चला रहा है। अब अंडर-14 लड़कों और अंडर-16 लड़कियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ट्रायल आयोजित किए जा रहे हैं, जिससे पहली बार लड़कियों की स्काउटिंग भी लड़कों के समान स्तर पर हो रही है।
भारतीय फुटबॉल का सबसे बड़ा बदलाव यही है कि अब किसी प्रतिभाशाली बच्चे को खोजने की जिम्मेदारी केवल स्काउट्स पर नहीं है। गांव के मैदान में अब प्रशिक्षित कोच मौजूद हैं, स्थानीय लीग उपलब्ध हैं और राष्ट्रीय स्काउटिंग नेटवर्क सीधे खिलाड़ियों को बड़े मंच तक पहुंचाने का रास्ता तैयार कर रहा है। मणिपुर और केरल का मॉडल दिखाता है कि सही व्यवस्था के साथ भारत भी विश्व फुटबॉल के लिए लगातार नए खिलाड़ी तैयार कर सकता है।







