असम में सरकार बनेगी किस की ? भाजपा या कांग्रेस की ?

गुवाहाटी

MANZAR ALAM-GUWAHATI-2By Manzar Alam 

असम में सरकार किस की बनेगी ? भाजपा की या कांग्रेस फिर सत्ता में वापस लौटेगी ? यह प्रश्न आज हर नागरिक और हर नेता के जुबां पर हैI यूं तो विधान सभा चुनाव पांच राज्यों में हुए थे लेकिन पूरी देश की नज़रें असम विधान सभा चुनाव के नतीजों पर टिकी हुई हैं I क्योंकि यही एक राज्य ऐसा है जहां बीजेपी की सरकार बनने की पूरी उमीदें जताई जा रही हैं I प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी भी असम में हर हाल में भाजपा की सरकार देखना चाहते हैंI असम चुनाव के नतीजे ही बीजेपी का भविष्य तै करेंगे I आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश में होने वाले विधान सभा चुनाव में बीजेपी की किया रण नीती होनी चाहिए और फिर केंद्र में अगली  सरकार बीजेपी बना सकेगी या नहीं इन सभी नीतियों के दिशा निर्देश असम विधान सभा चुनाव के नतीजे ही तै करेंगे I  यूं तो भाजपा और कांग्रेस दोनों सत्ता में आने के दावे कर रहे हैं I एग्जिट पोल के नतीजे भी बीजेपी के पक्ष में हैं I

अब कुछ घंटे ही बचे हैं जब असम विधानसभा की 126 सीटों की चुनावी तस्वीर 19 मई को मतगणना के साथ साफ होगी और यह भी स्पष्ट होगा कि क्या भाजपा पहली बार पूर्वोत्तर के किसी राज्य में सरकार बनाने की स्थिति में होगी या दिग्गज नेता तरुण गोगोई के नेतृत्व में लगातार चौथी बार राज्य में कांग्रेस की ही सरकार बनेगी।

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असम में दो चरणों में हुए मतदान में करीब 82 प्रतिशत मतदान हुआ। चार अप्रैल को 61 सीटों पर हुए मतदान में 84.72 प्रतिशत मतदान हुआ था जबकि 11 अप्रैल को 65 सीटों पर 80 प्रतिशत मतदान हुआ था। कांग्रेस ने बोडोलैंड क्षेत्र को छोड़कर अन्य भागों में अपने दम पर चुनाव लड़ा जबकि भाजपा ने असम गण परिषद के साथ गठबंधन किया। जेडीयू और आरजेडी ने बदरूद्दीन अजमल की पार्टी एआइयूडीएफ के साथ तालमेल किया ।

राज्य में परिवर्तन की हवा ज़रूर चली लेकिन खुद बीजेपी के नेताओं का कहना है की परिवर्तन की हवा इतनी तेज़ नहीं थी जितना हम सोच रहे थे I हवा का जोर उस वक़्त रहता था जब तक मोदी की सभाएं होती थीं  और इस हवा के जोर बनाए रखने में एक अकेले हिमंत बिस्वा शर्मा ही थे जो जहां भी सभाएं करते लाखों की संख्या में लोग पहुँचते थे I बीजेपी के कुछ दिग्गज नेताओं का मानना है कि इस बार पार्टी सरकार बनाने के आंकड़े के पास पहुँच सकती है और किसी हद तक सरकार बनाने में सफल भी हो सकती है लेकिन काफी मेहनत और तोड़ जोड़ की राजनीति के साथ I वहीं मुख्य मंत्री तरुण गोगोई कभी सत्ता में वापस आने की बात करते हैं तो कभी खिचड़ी सरकार बनने की I यानी कहीं न कहीं उन्हें भी यह डर सता रहा है कि परिवर्तन की हवा कहीं उन से सत्ता की कुर्सी छीन न ले I

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कांग्रेस से 9 विधायकों के साथ हिमंत बिश्व शर्मा के भाजपा में शामिल होने का भी कुछ नुकसान कांग्रेस पार्टी को होने का अनुमान व्यक्त किया जा रहा है, लेकिन बीजेपी को इस का सब से बड़ा फायदा होगा । भाजपा ने केंद्रीय मंत्री सर्वानंद सोनोवाल को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया इस का भी फायदा बीजेपी को ज़रूर मिलेगा I

इस चुनाव में गोगोई ने बीजेपी को बाहरी बताया और असम में घुसपैठ करने का आरोप लगाकर मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की। बिहार चुनाव में नीतीश के नारे का सहारा गोगोई असम चुनाव में लेते दिखे। समय-समय पर असम की राजनीति में प्रतिबंधित संगठन उल्फा समेत अन्य स्थानीय संगठन इस तरह से असमिया अस्मिता के विषय को पेश करते रहे ।

लेकिन इन सब के बावजूद जो सब से बड़ा तथ्य है शायद उसे एग्जिट पोल करने वाले एजेंसियों ने या तो नज़रंदाज़ किया या शायद उन्हें इस की जानकारी नहीं है I और यही तथ्य असम में सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं I असम में कुल मुस्लिम आबादी 34 फीसदी है। 9 जिलों के 39 विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 35 फीसदी से ज्यादा है। कांग्रेस को उस समय बड़ा झ्टका लगा, जब चौथी बार सरकार बनाने का दावा कर रहे मुख्यमंत्री तरुण गगोई के कुछ सहयोगियों ने बीजेपी का दामन थाम लिया।

जनजातियों का झुकाव पारंपरिक रूप से कांग्रेस की ओर रहा है, मगर चुनाव के नज़दीक आते आते स्थिति में कुछ बदलाव नजर आया। ऊपरी असम में सर्वानंद सोनोवाल की वजह से भाजपा इसमें सेंध लगाती दिखी  लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह वर्ग भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने में कितनी मदद करता है।

जहां तक अल्पसंख्यकों का सवाल है तो वे अजमल की पार्टी एआइडीयूएफ और कांग्रेस के बीच में बंटे हुए दिख रहे थे लेकिन चुनाव करीब आते आते उन का नज़रिया बदल गया था I उन का एजेंडा बदरुद्दीन अजमल को सत्ता तक पहुंचाना न रह कर बीजेपी को सत्ता तक पहुँचने से रोकने में बदल गया था I और अगर यह अजेंडा सही तरीके से काम कर गया तो फिर बदरुद्दीन अजमल को नुक्सान तो उठाना ही पड़ेगा साथ हे साथ बीजेपी को भी सत्ता के नज़दीक पहुंचने में काफी दिक्कतों का सामन करना पड़ सकता है I

भाजपा के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ रही अगप की पहली बार 1985 में और फिर 1996 में सरकार बनी थी। असम में 1952 से ही कांग्रेस का वर्चस्व रहा है। सिर्फ तीन बार गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं। अगप की दो बार और उससे पहले 1978 में जनता पार्टी की सरकार बनी थी।

असम में भाजपा के लिए काफी कुछ दांव पर है। ज्यादातर एक्जिट पोल नतीजों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत पाते हुए प्रस्तुत किया गया है। असम में अभी कांग्रेस के पास 78 जबकि भाजपा के पास महज 5 सीटें हैं। एआइयूडीएफ की 18 सीटें हैं जबकि भाजपा की मौजूदा गठबंधन सहयोगी बोडो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) और असम गण परिषद के पास क्रमश: 12 और 10 सीटें हैं।

बहरहाल ऊँट किस करवट बैठेगा यह तो चुनाव के नतीजे ही बताएंगे , हम तो केवल स्थितियों पर रोशनी ही डाल सकते हैं I अंतिम फैसला तो मतदाता ही सुनाएंगे I

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