कभी हाथों में थे जिनके हथियार, आज हैं वही सत्ता की दावेदार

गुवाहाटी  

By-  Rashmi Rekha Bhuyan 

कभी हाथों में थे जिनके हथियार, आज हैं वही सत्ता की दावेदार, जीहाँ हम क्या कहने जा रहे हैं, आप समझ रहे होंगे। फिर भी हम आप को याद दिला रहे  हैं, क्योंकि समय चुनाव का है और आप को अपना प्रतिनिधि चुनना है ।

असम विधानसभा चुनाव में इस बार भी कुछ पूर्व उग्रवादी चुनावी मैदान में है। आज से 10 साल पहले जब बोड़ो पीपुल्स फ्रंट ने बोड़ो लिबरेशन टाइगर के दर्जनों पूर्व उग्रवादियों को चुनावी मैदान में उतारा था तो चारों तरफ काफी चर्चाएं हुई थी। लेकिन आज कांग्रेस और बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टियां ही पूर्व उग्रवादियों को टिकट दे रही है।

बीपीएफ, जो पार्टी ज्यादातर बीएलटी के पूर्व उग्रवादियों से बनी हुई है, आज बीजेपी की गठबंधन पार्टी है। बीपीएफ ने इस बार तीन पूर्व बीएलटी उग्रवादी चंदन ब्रह्म, मनेश्वर ब्रह्म और महेश्वर बोड़ो को चुनावी मैदान में उतारा है। वहीँ बीजेपी ने भी दो पूर्व उग्रवादियों को टिकट दिया है जिनमें से एक पूर्व उल्फाई कुशल देउरी है जिन्होंने थाउरा से 2011 में निर्दलीय चुनाव लड़ा था। जबकि दूसरे उम्मीदवार है पूर्व उल्फाई भास्कर शर्मा जो मार्घेरिटा में कांग्रेस के उम्मीदवार प्रद्युत बोरदोलोई को टक्कर देंगे।

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इधर कांग्रेस ने पूर्व उल्फाई सुरेश बोरा को बढ़मपुर से दूसरी बार पूर्व मुख्यमंत्री तथा एजीपी नेता प्रफुल्ल महंत के खिलाफ मैदान में उतारा है। दुधनोई से शिव चरण बसुमतारी पूर्व बीएलटी उग्रवादी थे जिन्होंने कांग्रेस के टिकट पर 2011 का विधानसभा चुनाव जीता था।

दूसरी तरफ एजीपी ने नाउवैशा से पूर्व उल्फाई जयंत खाउंड को मैदान में उतारा है।

बीजेपी जहाँ यह मानती है कि पूर्व उग्रवादियों को टिकट देकर उन्हें देश के गणतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर दिया गया है। वहीँ बीपीएफ का दावा है कि यह एक ऐसा उदहारण पेश करेगा जो यह साबित कर देगा कि एक सशस्त्र उग्रवादी भी एक अच्छा जनप्रतिनिधि बन सकता है और एक अच्छी सरकार चला सकता है।

इस तरह अब पूर्व उग्रवादी भी राष्ट्रीय पार्टियों के पसंदीदा उम्मीदवार बनते जा रहे है। इन उम्मीदवारों को लेकर इन पार्टियों की जो भी राय हो लेकिन चुनाव में वोटिंग के जरिए जनता क्या राय सुनाती है यह देखने वाली बात होगी।

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