ज़रूर पढ़िए: राष्ट्रभक्त कौन ? एक खुली चर्चा

parwezBy Wamiq Pervez

आज हमारा देश उस दौर से गुजर रहा है जहां राष्ट्रभक्ति पर हर तरफ जोर-शोर से चर्चा हो रही है जो शायद इससे पहले कभी नहीं हुई है, ज़रुरत है इस पर एक खुली चर्चा की । कुछ लोग और कुछ संगठन अपने आपको सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रभक्त मानते हुए दुसरों को राष्ट्र विरोधी घोषित करने पर तुले हुए हैं और इन्हें कुछ लोग और कुछ संगठन ऐसा करने का कोई ना कोई मौका भी दे रहे हैं।

अपने इस प्यारे देश में कुछ लोग बात-बात पर बोलना और प्रतिक्रिया देना अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानने लगे है। अतः दूसरे भी इसी अधिकार का इस्तेमाल कर क्रिया और प्रतिक्रिया देने में लगे रहते है। ऐसे लोगों को इससे कोई मतलब नहीं है कि इससे राष्ट्र का माहौल कितना ख़राब होगा और इससे देश को आने वाले किसी भी समय में कितनी जान-माल का नुकसान उठाना पड़ सकता है।

देश की जान-माल और प्रगति आपसी सौहार्द पर निर्भर करता है, जो लोग देश के सौहार्द से रोजाना खिलवाड़ करते है या कर रहे है, यह देश हित में कतई नहीं है। इन सब बातों से देश कुछ अजीब हालत में फंसा सा दिखता है जबकि ज्यादातर देशवासियों को इन पचड़ों से कोई लेना- देना नहीं है, वह अपने परिवार की दो वक्त की दाल-रोटी प्राप्त करने में रात-दिन व्यस्त रहते हैं, ये वह लोग है जो अपने श्रम से देश की गाड़ी को आगे बढ़ाने में लगे रहते है। ऐसी राजनीति से उनका बहुत कुछ लेना-देना नहीं रहता है। कभी कभार चायखानों में बहस तक सीमित रहने वाले ये लोग हैं।

इस लेख के माध्यम से और पुराणों में दिए गए एक उदहारण से मैं यह समझाना चाहता हूँ कि असल देशभक्ति क्या है? यह लोगों को समझाया जा सके तथा कथित देशभक्तों में विभेद किया जा सके।

उदहारण कुछ इस प्रकार है कि – एक बार नारद मुनि ने नारायण (विष्णु भगवान) से यह जानना चाहा कि उनका सर्वश्रेष्ठ भक्त कौन है ( जैसा की आज देश में यह प्रमाणित करने की होड़ मची है कि असल राष्ट्रभक्त कौन सा संगठन या व्यक्ति है और कौन लोग नहीं हैं ) संभवत नारद मुनि को यह गुमान हो गया हो कि वह ही विष्णु जी  के परम एवं सर्वश्रेष्ठ भक्त होंगे क्योंकि उनके मुख से हमेशा नारायण-नारायण का जाप निकलता रहता है।

इसी जिज्ञासा के लिए नारद जी भगवान विष्णु जी के पास गए और उनसे विनम्रता पूर्वक अपने प्रश्न का जवाब जानना चाहा।

नारद मुनि की बात सुनने के बाद विष्णु भगवान कुछ समय के लिए चुप हो गए और अल्प विराम के बाद नारद जी का तात्पर्य या मतलब समझते हुए बोले इसके लिए आपको मृत्युलोक में अमुक जगह अमुक नाम के व्यक्ति से मिलना होगा। यह सुन नारद की थोड़ा अचंभित हुए पर साथ ही जिज्ञासा भी हुई कि देखे वह कौन व्यक्ति है, जो विष्णु जी का इतना बड़ा भक्त है, जो मैं नहीं हूँ। संभवतः वह बहुत बड़ा तपस्वी होगा। ऐसा सोचते हुए एक दिन नारद जी उस व्यक्ति के घर वेश बदलकर पहुंचे और प्रातः से रात तक एक-एक पल की जानकारी प्राप्त करते रहे। उन्होंने पाया की सुबह सवेरे जागने उस व्यक्ति ने हाथ जोड़कर ईश्वर को याद किया फिर घर के कार्यों में व्यस्त हो गया। जानवरों को चारा डाला, गाय-बकरियों को घास-फूंस डाला, बच्चों को स्कूल भेजा , नाश्ता इत्यादि करके पड़ोसियों की कुशल क्षेम जाना, जो पड़ोसी बीमार था उसे देखने गया, रास्ते भर लोगों का हाल चाल लेता हुआ खेत पर चला गया, दिनभर खेत में कार्य के बाद बाजार से घर के जरुरत का सामान लिया, घर आकर माता-पिता को उनका कुछ सामान दिया, पैर छुकर माता-पिता का आशीर्वाद प्राप्त कर पत्नी के और बच्चों के साथ गपशप किया, रात में अपने बिस्तर पर सोने से पहले एक बार हाथ जोड़कर “नारायण” कहकर सो गया।

यह सब देखकर नारद मुनि बहुत चकित हुए उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा था कि वो दिन-रात नारायण-नारायण का जाप करते नहीं थकते है यहाँ यह किसान मात्र एक बार नारायण बोलकर सर्वश्रेष्ठ भक्त कैसे हो सकता है। नारद मुनि इसी उधेड़-बुन में नारायण यानि विष्णु भगवान के पास जा पहुंचे और अपने मन के जिज्ञासा से अवगत कराया और बोले हे नारायण!यह सब जो मैं पृथ्वी पर देखकर आ रहा हूँ मेरे समझ से परे है, विश्वास नहीं होता वह व्यक्ति आपका सर्वश्रेष्ठ भक्त कैसे हो सकता है।

भगवान विष्णु जी नारद मुनि का अर्थ समझ गए और शांत भाव से बोले इसका उत्तर आपको अवश्य मिलेगा पर आपको मेरे एक आदेश का पालन करने के बाद।

हे प्रभु आप आज्ञा दें!

नारायण नारद मुनि को एक कटोरा जो तेल से लबालब भरा हुआ देते हुए बोले आप पुरे सृष्टि का एक चक्कर लगा कर आए, परंतु ध्यान रखिएगा अगर तेल कटोरे से तनिक भी छलक गया तो आपका सब प्रयास विफल माना जाएगा।

हे नारायण! ऐसा ही होगा । यह कहकर नारद मुनि सावधानीपूर्वक अपनी यात्रा पर निकल लिए। नारद मुनि पूरी परिक्रमा उपरांत हर्षित मुद्रा में नारायण के समक्ष उपस्थित हुए और कहने लगे कि हे प्रभु! आप स्वयं देख ले कि कटोरे से एक बूंद भी तेल छलकने नहीं पाया। इस प्रकार मैंने आपके आदेश का पूरा पालन किया है और अब आपसे विनती है कि आप मेरे प्रश्न का उत्तर देने की कृपा करें।

भगवान विष्णु जी ने मंद मुस्कान के साथ कहा आपने परिक्रमा अवश्य पूरी कर ली है पर नारद मुनि आपने नारायण का जाप कितनी बार किया।

यह सुनकर नारद निरुत्तर हो गए सकुचाते हुए बोले प्रभु मेरा सारा ध्यान तो तेल के ऊपर ही केंद्रित था, ताकि वह जरा सा भी छलकने न पाए। विष्णु भगवान ने आगे कहा कि मनुष्य के सामने अपने पेट रूपी भट्टी जो हमेशा दहकती रहती है, उसको भरते रहने की विराट समस्या है, हजारों कठिनाइयों को उसे दिन-रात झेलना पड़ता है और इसके लिए वह कठोर श्रम करता रहता है, बीमारी दुःख दर्द भिन्न भिन्न प्रकार से सहना पड़ता है, मोह माया उसे पथ से विचलित करती रहती है, बार-बार प्राकृतिक आपदाओं को सहन करना पड़ता है। इन सब परेशानियों को झेलते हुए भी यदि एक बार भी वह अपने हृदय से भगवान को याद करना नही भूले तो यह ही  उत्कृष्ट तपस्या है और धर्म भी यही है।

इस पौराणिक कथा का सार यह है कि कुछ लोग यदि रात-दिन देश का झंडा हाथ में लेकर लहराते रहे , हर समय राष्ट्र का गुणगान करते रहे, वंदे मातरम और जन-गण-मन राष्ट्रगान गाते ना थकते हों, भारत माता की जय का नारा चिल्ला चिल्लाकर लगाते रहे, 207 फिट से भी अधिक ऊँचा झंडा अपने-अपने घरों में, ऑफिसों में फहराते हो, अपने-अपने घरों में भारतमाता की छवि पर पुष्प वर्षा करते हो, रोज सुबह भारतमाता की छवि के समक्ष दंडवत प्रणाम करते हों एवं जो ऐसा न करता हो, उसको दोषारोपित कर दंड देने का भय दिखाते हो, तो क्या ऐसे लोगों को ही सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रभक्त माना जाएगा, चाहे इनमें से बहुत सारे लोग रोज़ अपने ऑफिस में ईमानदारी से काम न करते हो, ऑफिस समय में भी घरेलू कार्यों को कुशलता से निपटाते हो, समय पर कार्य पूरा न करते हों , समय पर ऑफिस न आते हो, घूस के बगैर कोई फाइल आगे न बढ़ाते हों, घूस लेते और देते हों, अपने-अपने घरों में बिजली चोरी कर राष्ट्र के हित को क्षति पहुंचाते हों, अपने-अपने वाहनों को दूसरों की असुविधा का ध्यान दिए बिना यहाँ-वहां पार्किंग कर देते हो, सरकारी वाहनों का खुलकर दुरूपयोग करते हो, जूनियर वर्कर को अपनी सुविधा में जोते रहते हो, एलपीजी सिलिंडर में गैस कम देते हों एवं सरकारी गाड़ियों से डीजल-पेट्रोल चोरी करते हों, जनता को सामान कम तौलते हों, दाम ज्यादा लेते हो, स्वयं लाभ के लिए चीजों में जमकर मिलावट का ज़हर बेचते हों। सरकार को टेक्स कम देते हो, पर खुद ज्यादा हजम कर जाते हो, बिना टिकट यात्रा कर देश को नुकसान पहुंचाते हों, रेलवे की संपत्ति को अपनी संपत्ति मानकर ट्रेनों, ऑफिसों से सामान चोरी कर रेलवे को नुकसान पहुंचाते हों, बात-बात पर स्ट्राइक और प्रोसेशन निकालते हों, राष्ट्रश्रम की क्षति के साथ-साथ बसों, ट्रेनों एवं अन्य चल-अचल संपत्ति को तोड़ते हों, जलाते हो, जान-माल को क्षति पहुंचाते हों। धर्म एवं मज़हब के नाम पर समाज को बांटते हो, जहर फैलाते हो और आपसी भाईचारे को दूषित करते हों। साथ ही कुछ लोग अपने-अपने धर्म के तुच्छ ज्ञान के आधार पर यह विचार प्रकट करते है कि उनके धर्म में यह ‘मना’ है। ऐसा कर नहीं सकते या बोल नहीं सकते है, पर इन्हीं में से कुछ लोग जो धर्म में मना है, स्पष्ट शब्दों में उसे करने से नहीं हिचकते जैसे शराब पीना, जुआ खेलना, दुष्कर्म करना, झूठ बोलना, लोगों को ठगना, चोरी करना, इधर की बात उधर करना, पड़ोसियों को सताना, दुकान इत्यादि सड़क तक अतिक्रमण कर राहगीरों को दुर्घटना की दावत देना। ऐसे सभी काम बिना समाज के भय के खुलकर करते है।

अब यदि ऊपर बताए गए गुणों या अवगुणों के आधार पर सर्वश्रेस्ठ भक्त की तरह ही राष्ट्रभक्तों की पहचान की जाए , तो हम स्वयं अनुमान लगा सकते है कि पुरे भारतवर्ष में उच्च राष्ट्रभक्त कितने प्राप्त होंगे। हमें नारद मुनि जी की कथा से यह उत्तर स्वयं प्राप्त हो जाएगा और हमें तुच्छ राष्ट्रभक्त और सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रभक्त में अंतर समझ में आ जाना चाहिए।

हम सब अपने श्रम एवं कर्म का गुलदस्ता रोज राष्ट्र को अर्पित करें यही उत्कृष्ट देशभक्ति होगी।

(वामिक परवेज़)

 

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