चुनाव और मजहब के बीच क्या रिश्ता है: एक समीक्षा

गुवाहाटी

By Rashmi Rekha Bhuyan

2016 का असम विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुका है और अब सभी की निगाहें चुनाव के नतीजों पर टिकी हुई है। लेकिन जो सवाल हम आज उठा रहे है वह बेहद ही गंभीर सवाल है। क्या भारतीय संविधान में हर मतदाता को अपनी इच्छानुसार मतदान करने का हक है? क्या वह अपनी इच्छानुसार अपना पसंदीदा उम्मीदवार चुन सकता है? किसी खास पार्टी को वोट देने के लिए क्या उसे मजबूर करना सही है? चुनाव और मजहब के बीच क्या रिश्ता है?

इन सारे सवालों के जवाब आज हम इसलिए तलाश रहे है क्योंकि हाल ही में असम विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के मतदान के बाद एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है।

एक मुस्लिम शख्स ने अपनी पत्नी को सिर्फ इसलिए तलाक दे दिया क्योंकि उसने अपने पति और गांव के फरमान को ठुकराकर बीजेपी को वोट किया था। घटना सोनितपुर जिले के डोनाम अद्धाति गांव की है जहाँ के मुखिया का लगाव कांग्रेस से अधिक होने की वजह से कांग्रेस के पक्ष में गांववालों से वोट करने का फरमान जारी किया गया। जानकारी के मुताबिक आईनुद्दीन नामक शख्स की पत्नी दिलवारा बेगम ने बीजेपी के उम्मीदवार प्रमोद बरठाकुर के पक्ष में अपना वोट डाला जिससे गुस्से में आकर उसके पति ने 10 साल की अपनी शादीशुदा जिंदगी को भुलाकर एक ही पल में उसे तलाक दे दिया।

इस घटना ने एक बात तो साबित कर दी है कि इस बार के चुनाव में हिन्दू और मुस्लिम के बीच वोटों का विभाजन हुआ है। राजनीतिक विचारकों का मानना है कि असम के 34 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं में से अधिकांश ने कांग्रेस को वोट दिया है जबकि राज्य के अधिकांश हिंदुओं का वोट बीजेपी के पक्ष में गया है।

इस चौंकाने वाली घटना के बाद हमने जो सवाल उठाए है वह काफी महत्वपूर्ण है। चूँकि वोट डालने का अधिकार हर नागरिक को है। अपनी पसंद का उम्मीदवार हर नागरिक चुन सकता है। ऐसा कोई समाज या संस्था नहीं है जो किसी का यह अधिकार छिन सके। जरुरत है तो हर नागरिक को जागरूक बनने की और इस बात को समझने की ताकि ऐसी घटनाएं ना दोहराई जाए।

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