वाराणसी-पहली बार काशी में किन्नरों ने किया पिंड दान

वाराणसी

विश्व की धार्मिक व सांस्कृतिक राजधानी काशी में शनिवार को नई परम्परा का आरम्भ हुआ I अब तक के इतिहास में पहली बार आश्विन कृष्ण पक्ष की नवमी यानी पितृपक्ष की नवमी तिथि पर पहली बार काशी के पिशाचमोचन कुंड पर किन्नरों ने अपने पितरों को याद करते हुए पिंड दान किया। पिशाचमोचन के मुख्य पंडित मुन्ना लाल पांडे द्वारा कराया गया त्रिपिंडी श्राद्ध। इसमें 25 हिंजड़े शामिल हुए। सभी किन्नरों  ने मिलकर अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध कराया ।

बताया जाता है कि एक सप्ताह पहले ही पिशाच मोचन के महंत पुन्नालाल पांडेय को यह सूचना दी गई थी कि किन्नरों  का अखाड़ा 25 की संख्या में त्रिपिंडी श्राद्ध करने पहुंचेंगा। शनिवार को सुबह 11:00 से 2:00 बजे तक श्राद्ध कर्म चला। इसके तहत बाजे गाजे के साथ सभी किन्नरों ने  पिशाचमोचन पर उपस्थित हुए। इस दौरान दर्शकों की भारी भीड़ जमा हो गई थ। पिशाचमोचन पर स्टेज लगाकर लोगों का स्वागत किया गया। दान दक्षिणा लेने के बाद सभी के किन्नरों को विदा किया गया।

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यह सनातनी हिंदू परंपरा में मील का पत्थर है। इससे पहले तक ऐसा कभी नहीं हुआ। इस पिंडदान के लिए देश भर के हिकिन्नर शुक्रवार से ही काशी पहुँच गए थे । पहले दिन इन किन्नरों ने बाबा विश्वनाथ का दर्शन-पूजन किया था। फिर मां गंगा की आराधना की थी। आज इन्होंने पुरखों को तारने के लिए पिंडदान किया।

आपको बता दें कि आदिकाल से चली आ रही परंपरा ने किन्नरों के सम्मानपूर्वक जीने पर ही नहीं बल्कि मरने पर भी प्रतिबंध लगा रखा है। हिंदू धर्म में जन्म लेने के बावजूद किन्नरों का शवदाह नहीं होता। उन्हें दफनाया जाता है और हिंदू परंपरा के अनुसार उनका तर्पण भी नहीं किया जाता।

किन्नर अखाड़ा के महामंडलेश्वर ने कहा कि परंपरा तोड़ने का मकसद सिर्फ यह है कि हिंदू धर्म में जन्मे किन्नरों को सम्मानपूर्वक मरने का अधिकार मिलना चाहिए। गंगा महासभा के स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा यह पहला मौका है जब किन्नरों ने खुद को सनातन हिंदू मानते हुए पिंडदान के जरिए अपने समुदाय के पितरों का याद किया

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