जनजातिकरण का मामला, जनसमुदायों में आरक्षण को लेकर आशंका

गुवाहाटी

असम के 6 ओबीसी समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के संदर्भ में विशेषज्ञ समिति के रिपोर्ट सौंपने से पहले ही आरक्षण को लेकर आशंका पैदा हो गई है| ख़ास तौर से जिन समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा पहले ही मिला हुआ है उन्हें आशंका है कि अगर और भी समुदायों को यह दर्जा दिया गया तो कही उन्हें पहले से मिल रहे लाभों से वंचित ना होना पड़े| वही जनजातिकरण की आस में बैठे ओबीसी समुदायों को उम्मीद है कि अनुसूचित जनजाति का कोटा बढ़ाया जाएगा|

गृह मंत्रालय को 15 अक्टूबर को रिपोर्ट सौंपने से पहले विशेषज्ञ समिति ने दोनों पक्षों की राय ले ली है| इस समिति का गठन गृह मंत्रालय के आंतरिक सुरक्षा सचिव महेश कुमार सिंगला की अध्यक्षता में 1 मार्च को किया गया था| समिति ने सितंबर महीने में असम के 6 जनसमुदायों के अलावा इस सिलसिले में मांग का विरोध करने वाले पक्ष से भी बात की|

अहोम, कोच-राजवंशी, मोरान, मटक, चुतिया और चाय जनसमुदाय के जनजातिकरण की मांग का समर्थन ना केवल बीजेपी और उसकी गठबंधन पार्टी कर रही है बल्कि विपक्षी कांग्रेस का भी इन्हें समर्थन हासिल है| वही 10 जनसमुदाय इसका विरोध कर रहे है| इन जनसमुदायों का कहना है कि इन 6 जनजातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का प्रस्ताव सरकार की साजिश है| सरकार मौजूदा असम की अनुसूचित जनजाति के लोगों को प्रताड़ित करना चाहती है|

आपको बता दें कि मौजूदा असम में अनुसूचित जनजाति का दर्जा हासिल कर चुके जनसमुदायों में बोड़ो, राभा, तिवा, कार्बी, डिमासा, मिसिंग, सोनोवाल, हाजोंग, गारो और देवरी शामिल है|

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