मिजोरम विधान सभा चुनाव: कांग्रेस की अग्नीपरिक्षा

पूर्वोत्तर का राज्य मिजोरम में 28 नवंबर को होने जा रहा विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं है.


आइजोल

पूर्वोत्तर का सब से छोटा राज्य मिजोरम में 40 सदस्यीय विधानसभा के लिए 28 नवंबर को होने जा रहा विधानसभा चुनाव सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए अग्निपरीक्षा  से कम नहीं है. 10 साल से यहां सत्ता पर बैठी  कांग्रेस पार्टी की साख और वजूद इस बार दांव पर है.  दो-तीन साल पहले तक इलाके के तमाम सातों राज्यों में उसकी सरकार थी, लेकिन अब वह केवल मिजोरम तक सिमट कर रह  गयी है.

पार्टी की हालत और खराब हो गयी जब हाल ही में पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने विपक्षी मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) का दामन थाम लिया. ऐसे हालात में  पूर्वोत्तर राज्यों में अपने इस आखिरी गढ़ को बचाना पार्टी के लिए कड़ी चुनौती बन गयी है. लेकिन बावजूद इसके कांग्रेस नेता राज्य में जीत की हैट्रिक लगाने का दावा कर रहे हैं.

लगातार दस साल से सत्ता में रहने की वजह से उसे इस बार विरोधी लहर के अलावा भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोपों से भी पार्टी को जूझना पड़ रहा है.  इन समस्याओं की काट के लिए ही उम्मीदवारों की सूची से कई निवर्तमान विधायकों का पत्ता साफ करते हुए एक दर्जन से ज्यादा नए चेहरों को जगह दी गयी है.

वर्ष 2008 के विधानसभा चुनावों में जोरमथांगा की अगुवाई वाली एमएनएफ सरकार को हटा कर कांग्रेस सत्ता पर काबिज हुई थी.  उस साल उसे 40 में से 32 सीटें मिली थीं, जबकि एमएनएफ को महज तीन सीटों से ही संतोष करना पड़ा था.

पांच साल बाद वर्ष 2013 के चुनावों में कांग्रेस को 34 सीटें मिलीं तो एमएनएफ को पांच.  पांच बार चुनाव लड़ने के बावजूद इस ईसाई-बहुल राज्य में अब तक भाजपा का खाता नहीं खुल सका है.  इस बार भी भाजपा अपने बूते यहां कुछ खास करने की स्थिति में नहीं है.

लेकिन दो-एक सीटें जीतने के बावजूद वह अपनी सहयोगी एमएनएफ का हाथ थाम कर पिछले दरवाजे से सरकार में शामिल हो सकती है.  मणिपुर और मेघालय में भी उसने यही किया था.  फिलहाल एमएनएफ और भाजपा अकेले ही मैदान में हैं.  चुनावी नतीजों के बाद दोनों के बीच तालमेल हो सकता है.

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