माजुली से बीजेपी को जीत की उम्मीद, क्यों और कैसे

गुवाहाटी

By-  Rashmi Rekha Bhuyan 

Sarbananda-Sonowalमौसम चुनाव का है और ऐसे में विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप माजुली इस बार राष्ट्रीय राजनीति की सुर्खियों में है। वजह यह है कि बीजेपी ने यहीं से अपना सीएम पद का उम्मीदवार खड़ा किया है। जी हाँ सर्वानंद सोनोवाल यहीं से चुनाव लड़ रहे हैं । लेकिन माजुली से बीजेपी को जीत की उम्मीद, क्यों और कैसे है, यह एक बड़ा सवाल है ।

माजुली आखिरी बार 1997 में राष्ट्रीय सुर्खियों में आया था जब उल्फा ने संजय घोष नामक एक सामाजिक कार्यकर्ता का पहले अपहरण कर रहस्यजनक हालात में उनकी हत्या कर दी थी। हालांकि घोष का शव कभी बरामद नहीं हुआ। घोष उस समय एक एनजीओ के साथ मिलकर ब्रह्मपुत्र के भू-कटाव से माजुली को बचाने के कार्य में जुटे थे।

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हर साल मानसून के समय बाढ़ की समस्या को लेकर माजुली स्थानीय समाचारों में सुर्खियां बटोरती है। हर साल यहाँ का एक बड़ा भू-भाग ब्रह्मपुत्र में समा रहा है। लोग बेघर हो रहे है। उनकी उम्मीदें उनका साथ छोड़ रही है। लेकिन इसके बावजूद राष्ट्रीय पटल पर उपेक्षा की शिकार माजुली दशकों बाद बीजेपी के सीएम पद के उम्मीदवार सर्वानंद सोनोवाल को लेकर सुर्खियों में आई है। खास तौर से तब जब देश के किसी प्रधानमंत्री ने पहली बार माजुली में कदम रखा। 26 मार्च को पीएम मोदी ने यहाँ बड़ी चुनावी रैली की थी।

सबसे बड़ा सवाल यहाँ यह है कि माजुली जो एक छोटा सा विधानसभा क्षेत्र है बीजेपी ने यहाँ ऐसा क्या देखा कि पार्टी का सीएम पद का उम्मीदवार यहाँ से खड़ा किया गया?

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असम प्रदेश जहाँ 30 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम मतदाता है वहां बीजेपी की उम्मीदें हिन्दू मतदाताओं पर टिकी है और यहीं माजुली को चुनने की सबसे बड़ी वजह है। माजुली वैष्णव संस्कृति का मुख्य केंद्र है। राज्य के 800 सत्रों में से करीब 60 सत्र माजुली में है। चूँकि बीजेपी हिन्दू कार्ड खेलने में विश्वास रखती है इसलिए इस बार उन्होंने सत्र से जुड़े लोगों को आकर्षित करने की खास कोशिश की है।

लेकिन बात अगर माजुली की हो तो संजय घोष हत्याकांड के दशकों बाद भी यहाँ के हालात नहीं बदले है। लोग आज भी खौफ में जीते है। रोचक बात तो यह है कि 1986 में छात्र नेता सौरभ बोरा के हत्याकांड में सर्वानंद सोनोवाल समेत 5 लोगों के नाम थे जिन्हें सबूत ना होने की वजह से हाई कोर्ट ने बरी कर दिया था।

ऐसे आरोपों से बीजेपी भले ही किनारा करे पर सवाल यह है कि राजनीती आम जनता की उम्मीदों से कब तक खिलवाड़ करती रहेगी। क्या बीजेपी अपने मकसद में कामयाब होगी।

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