इस्लाम, परिवार नियोजन और डॉ इलियास अली

MANZAR ALAM- TAWANGगुवाहाटी

By Manzar Alam, Founder Editor 

किया  इस्लाम  “परिवार नियोजन के साधनों” को अपनाने की इजाज़त नहीं देता? किया पुरुषों या महिलाओं के लिए नसबंदी करवाना गुनाह है? शायद आप कहेंगे हाँ…. लेकिन यदि असम के डॉक्टर इलियास अली की माने तो जवाब मिलेगा नहीं, बिलकुल नहीं…. डॉ. इलियास के अनुसार इस्लाम और परिवार नियोजन का संबन्ध बहुत गहरा और बहुत पुराना है. डॉ इलियास कहते हैं की कुरान में लिखा है की “केवल बच्चे को जन्म देने से ही मातापिता की ज़िम्मेदारी  खत्म नहीं होती बल्कि उन्हें पाल-पोस कर, पढ़ा-लिखा कर एक अच्छा इंसान बनाने की ज़िम्मेदारी भी मातापिता की ही है. हदीस में इस बात का ज़िक्र है की दो बच्चों के बीच का फासला कम से कम 30 से 36 महीनों का होना चाहिए “.

dr-ilias-ali-2पिछले 8 वर्षों से डाक्टर इलियास गाँव गाँव जा कर मुसलमानों तक कुरान और हदीस का यही पैगाम पहुंचा रहे हैं. और अब उन की यह मेहनत रंग लाने लगी है. कल तक जो लोग “परिवार नियोजन ” के खिलाफ थे आज खुद चल कर अस्पताल पहुँच रहे हैं और अपना नसबंदी करवाकर खुशी खुशी घर लौट रहे हैं.

परिवार नियोजन के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से सन 1993 में ही असम में NSV (No Scalpel Vasectomy)  का सपना देखा गया था. लेकिन जनवरी 2009 तक यह सपना ही बना रहा. 2009 में डॉ. इलियास अली को NSV कार्यक्रम का स्टेट नोडल ऑफिसर नियुक्त किया गया जिसके बाद उन्होंने इसे लोगों तक पहुँचाने का लक्ष्य बना लिया.

अब तक हज़ारों कामयाब सर्जरी ऑपरेशन कर चुके डॉ. इलियास अली गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी मेडिसिन विभाग के HOD,MS प्रोफेसर ऑफ सर्जरी तथा परिवार नियोजन और नेशनल हेल्थ मिशन के सीनियर कंसलटेंट प्रोफेसर है.

अपने मिशन को पूरा करने के लिए डॉ. इलियास राज्य के उन दुर्गम तथा पिछड़े हुए इलाकों में भी गए जहाँ आम तौर पर लोग जाने से कतराते है और न ही आज तक वहाँ कोई डाक्टर गया है. लेकिन डॉ. इलियास का जूनून उन्हें इन इलाकों में ले कर जा रहा है जहां तक पहुँचने के लिए उन्हें कभी किसी मोटर साइकिल या नौका का सहारा लेना पड़ता है तो कभी ब्रहमपुत्र के रेत पर मीलों पैदल चलना पड़ता है तो कभी घंटों बैलगाड़ी का सवारे कर वह उन दूर दराज़ गाँव में पहुँचते हैं और वहां बसे मुस्लिम परिवार को इस्लाम की रोशनी में परिवार नियोजन की जानकारी देते हैं.

दरअसल यह सभी इलाके मुस्लिम बाहुल्य वाले इलाके हैं जहां लोगों के पास न ही खेती करने के लिए ज़मीन है और न पैसे कमाने के लिए नौकरी. यदि कुछ है तो तेज़ी से बढ़ रही जनसंख्या कियोंकि कम पढ़े लिखे यहां के बाशिंदे “परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण” को गैर इस्लामी मानते हैं.

dr-ilias-ali-4डॉ. इलियास के मुताबिक शुरू-शुरू में उन्हें लोगों तक पहुँच बनाने में काफी दिक्कत हुई चूँकि लोग इस तरह के परिवार नियोजन को इस्लाम के विरुद्ध मानते है. गाँव के लोग और धार्मिक नेताओं ने उनके इस मिशन में रुकावट डालने की कोशिश की लेकिन उन्होंने पवित्र कुरान का सहारा लेकर लोगों को हकीकत से रूबरू कराया और उन्हें समझाया कि बढ़ती आबादी कैसे धरती का दुश्मन बनती जा रही है और इस धरती को बचाए रखने के लिए हर इंसान की पहली हमें किया करना चाहिए. उन्हों ने लोगों को बताया की इस्लामिक देश इरान में NSV काफी प्रसिद्ध है जहाँ 1993 से 2004 तक 3.75 लाख लोगों का NSV कराया गया.

कुरान के आयत और हदीस का ज़िक्र करते हुए डॉ. इलियास उन्हें यह समझाने की कोशिश करते हैं की “परिवार नियोजन के साधनों को अपनाना इस्लाम के खिलाफ नहीं है बल्कि यह प्रचार पूरी तरह से भ्रामक एवं असत्य है. वास्ताविकता इस के ठीक विपिरित है. सच कहा जाए तो इस्लाम एकमात्र ऐसा धर्म है जिस में जनसंख्या नियंत्रण के तौर तरीकों का उल्लेख है जिसे आजाल कहा जाता है”. आजाल का ज़िक्र करते हुए डा. इलियास महिलाओं को यह समझाने का प्रयास  करते हैं की “माँ का दूध पर केवल बच्चे का हक है और जब तक बच्चा 30 से 36 महीने का नहीं हो जाता उस से यह हक नहीं छीना जाना चाहिए. इस का अर्थ यह होता है की जब तक बच्चा तीन वर्ष का नहीं हो जाता दुसरे बच्चे के जन्म के बारे नहीं सोचना चाहिए”. और यही बात तो सरकार उन्हें वर्षों से समझाने की कोशिश कर रही है जो वोह या तो समझ नहीं पा रहे या फिर समझना नहीं चाहते थे.

डॉ. इलियास के अनुसार कुरान के दो नंबर सूरह और 31 नम्बर आयत में अल्लाह ने फरमाया है की….”माँ को कम से कम 2 साल तक बच्चे को दूध पिलाना चाहिए, बच्चे को माँ का दूध छोड़ने के लिए कम से कम ढाई साल का समय चाहिए.

dr-ilias-ali-5मुसलमानों के बीच जनसंख्या नियंत्रण के प्रति जागरूकता फैलाने का यह जूनून डॉ. इलियास को वर्ष 2008 के जनवरी माहीने में सवार हुआ जब असम सरकार ने उन्हें परिवार नियोजन कार्यक्रम NSV का नोडल ऑफिसर की ज़िम्मेदारी सौंपी. डॉ. इलियास ने अपने इस ज़िम्मेदारी को एक चुनौती मान कर कबूल तो कर लिया लेकिन यहाँ कामयाबी के रास्ते बड़े कठिन थे. वोह जहां भी जाते उन्हें विरोध का सामना करना पड़ता. तब उन्हों ने “परिवार नियोजन” को धर्म की रौशनी में समझने का फैसला किया. इस के लिए वोह कई मौलवी के पास गए उन से “परिवार नियोजन” के बारे में यह जानने की प्रयास किया के इस्लाम इस बारे में किया कहता है. उन्हों ने कुरान और हदीस का गहराई से अध्धयन किया. वोह जितना अध्धयन करते गए, “परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण” से सम्बंधित उन्हें सभी प्रश्नों का उत्तर मिलता गया. उन के इस अध्धयन में उन का सब से बड़ा मददगार साबित हुआ इंटरनेट. इन्टरनेट के द्वारा उन्हें यह पता चला के विश्व भर के मुस्लिम देश अपने यहाँ “परिवार नियोजन और जनसख्या नियंत्रण से सम्बंधित” कार्यक्रम को सफल बनाने की ज़िम्मेदारी धार्मिक नेताओं को सोंपा है. धार्मिक नेता कुरान और हदीस का सही व्याखा करते हुए दम्पतियों को “परिवार नियोजन” की और आकर्षित करते हैं और यही कारण है की वहाँ “परिवार नियोजन” कार्यक्रम सफल हो रहे हैं.

करीब तीन महीने तक अध्धयन  करने के बाद डॉ. इलियास ने ठीक उसी तरह अपना मिशन शुरू किया. अप्रैल 2008 में पहला “ परिवार नियोजन जागरूकता कार्यशाला” का आयोजन किया और पहली बार“परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण” को इस्लाम की रौशनी में विस्तार से लोगों को समझाया. डॉ. इलियास का यह प्रयास रंग लाया और 16 लोगों ने नसबंदी करवाने की हामी भर दी. और यहीं से शुरू हुआ डाक्टर इलियास का इस्लाम की रौशनी में “ परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण  कार्यक्रम का सफर ”.

डॉ. इलियास की माने तो “मुसलमान अब आगे आ है हैं…… परिवार नियोजन के अलग अलग साधनों का प्रयोग कर रहे हैं…..मैं कह सकता हूँ की अब इस का कोई विरोध नहीं करता है……ज़रूरी यह है की हम उन्हें परिवार नियोजन के बारे में सही तरीके से समझाएं”  ऐसा कहना है डॉ. इलियास का.

dr-ilias-ali-6डॉ. इलियास के भाषण का असर दगावं के रहने वाले दो भाई अब्दुल अजीज और अब्दुल  रहीम पर ऐसा हुआ की दोनों साथ अस्पताल पहुँच गए और नसबंदी करवा लिया.

अजीज पेशे से मजदूरी करता है लेकिन परिवार में 7 बच्चे हैं. रहीम कपड़े इस्त्री करने का काम करता है लेकिन कम समय ही में 6 बच्चों का पिता बन बैठा. अब दोनों भाईओं का कहना है की…. देर से सही उन की नींद तो टूटी. पहले वोह परिवार नियोजन के साधनो का प्रयोग को गैर इस्लामी मानते थे. लेकिन अब उन्हें समझ में आने लगा है की बच्चों को जन्म देना ही माता पिता का फर्ज नहीं है बल्कि उन्हें पढ़ा-लिखा कर एक अच्छा इंसान भी बनान ज़रूरी है.

अब्दुल रहीम कहते हैं की “बच्चों को पढ़ाना लिखाना है… कमाई उतना नहीं होता है….खर्चा अधिक है…फिर कहीं और बच्चा न हो जाए…….इस लिए हम दोनों भाइयों ने ऑपेरशन करवा लिया”

अब डॉ.  इलियास के साथ उन का एक पूरा टीम बनचुकी है. डाक्टर इलियास जिस गाँव में पहुंचते हैं उन्हें सुनने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग इकठ्ठा होते हैं. उन का भाषण खत्म होते ही शुरू हो जाता है ऑपरेशन का सिलसिला. लोग खुशी खुशी नसबंदी कारवाने आ जाते हैं. नसबंदी के लिए डॉ. इलियास अधिकतर NSV  ( NO SKELPAL VESKATOMY ) का विधि अपनाते हैं.

NSV विधि को सब से पहले चीन में डाक्टर ली शुन्कियांग ने वर्ष 1984 में प्रयोग किया. इस विधि में  कोई कांट छांट नहीं किया जाता है बल्कि केवल एक सुई चुभोई जाती है. ऑपरेशन के दौरान मरीज़ को न ही दर्द होता है और न ही अस्पताल में रुकने की ज़रूरत पड़ती है. 15 से 20 मिनट में ऑपरेशन हो जाता है और एक घंटे के बाद मरीज़ घर चला जाता है.

dr-ilias-ali-7ग्रामीण स्वस्थ केन्द्रों में अब तो महिलाएं भी नसबंदी करवाने के लिए आगे आने लगी हैं. और परिवार नियोजन के साधनों का प्रयोग भी कर रही हैं. इस काम में डॉ. इलियास का सब से बड़े सहयोगी हैं “आशा कर्मी” जो गाँव गाँव घूम घूम कर महिलाओं को परिवार नियोजन और उस के साधनों का विस्तृत जानकारी देती हैं.  यही वजह है की वर्ष 2009 से लेकर 2015 तक करीब 55 हज़ार पुरुष और 3 लाख से अधिक महिलाएं नसबंदी करवा चुके हैं. और उस से भी अधिक परिवार नियोजन साधनों का प्रयोग कर रहे हैं.

डॉ. इलियास का कहना है की जनसंख्या पर नियंत्रण तब ही पाया जा सकता है जब समाज के सभी वर्गों की इस में भागेदारी होगी. इस सन्दर्भ में मुसलमानों के बीच जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता का धुवांधार प्राचार करने के बाद डॉ. इलियास राज्य के उन आदिबासी गाँव का रुख कर रहे हैं जहां कम शिक्षित लोग रहते हैं.

आज हमारे इस कायनात को यदि सब से अधिक किसी चीज़ से खतरा है तो वोह बढ़ती जनसंख्या से. दुनिया भर के सभी देश जनसंख्या को काबू करने के लिए अपने अपने तरह के प्रयास कर रहे हैं. उन्हीं प्रयासों में कुरान और हदीस की रौशनी में परिवार नियोजन का डॉ. इलियास का यह नुस्खा एक महत्व पूर्ण कड़ी बन गया है जो उनेहं असम की गलियों से निकाल कर देश विदेश में चर्चित कर रहा है.

डॉ. इलियास ने बताया कि उनके इस मिशन को राज्य के कोने-कोने तक पहुँचाने में मीडिया का भी बड़ा हाथ रहा है. उन्होंने बताया कि फ़रवरी 2009 से अब तक 100 से अधिक डॉक्टरों को NSV तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा चुका है| जनवरी 2009 से 31 मार्च 2016 तक 53,000 लोग NSV को अपना चुके है.

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