पोल सर्वे ने बढ़ाई बीजेपी की मुश्किलें, ऐआईयूडीऍफ़ भी परेशान

गुवाहाटी

MANZAR ALAM-GUWAHATI-2By Manzar Alam

असम विधान सभा चुनाव से संबंधित एक राष्ट्रीय चैनल पर मंगलवार को प्रसारित पोल सर्वे ने जहां बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा दी है वहीं इस सर्वे से ऐआईयूडीऍफ़ भी परेशान है. पोल सर्वे के मुताबिक असम में इस बार भाजपा और उसके सहयोगी दल विधान सभा की 126 में से 78 सीटें पर जीत कर सरकार बना सकते हैं। वहीं पोल में जहां कांग्रेस को केवल 36 सीटों पर सिमटता हुआ दिखाया गया है, वहीं एआईयूडीएफ को महज 10 सीटें और अन्य दलों को 02 सीटें मिलने की बात कही गई है.

abp-surveyचैनल द्वारा प्रसारित इस आंकड़े ने जहां भाजपा के आम कार्यकर्ताओं में खुशी की लहर दौड़ा दी है वहीं पार्टी के नेताओं और चुनाव लड़ रहे उमीदवारों को परेशानी में डाल दिया है. क्योंकि हकीकत में  इस आंकडे ने बीजेपी को सत्ता से एक क़दम दूर कर दिया है.

असम की राजनीती और मतदाताओं के नब्ज़ को समझने और परखने वाले राजनितिक पंडितों की माने तो बीजेपी असम में सत्ता पर काबिज़ होने वाली है, इस खबर से सब से अधिक नुक्सान ऐआईयूडीएफ़, उस के बाद बीजेपी को होगा, और फायदा केवल और केवल कांग्रेस को ही होना है.

अब ज़रा इस राजनीती जोड़ तोड़ को समझिए,  असम में सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले असमिया और मुस्लिम मतदाता है. असमिया मतदाता कभी भी नहीं चाहता है की कोई गैर असमिया व्यक्ति असम में सत्ता का भागीदार बने.  दूसरी तरफ मुस्लिम मतदाता है जो कभी नहीं चाहते हैं की असम में बीजेपी सत्ता पर कब्ज़ा जमाए.

अब ज़रा 2011 के विधान सभा चुनाव के दौरान हुए राजनीती समीकरण पर नज़र डालिए. चुनाव से ठीक पहले जब कांग्रेस को लगा था की वह अपने बलबूते पर  सरकार नहीं बना सकेगी तो उस ने ऐआईयूडीऍफ़ के साथ समझौता कर ली. चुनाव से दो दिन पहले जैसे यह खबर फैली की कांग्रेस ऐआईयूडीएफ़ के साथ मिल कर सरकार बना सकती है और बदरुद्दीन अजमल को उप मुख्य मंत्री की कुर्सी दी जा सकती है. असमिया मतदाताओं को यह नगावर गुजरा और उन्हों ने बदरुद्दीन अजमल को सत्ता से दूर रखने के लिए एक जुट हो कर कांग्रेस के वोट दिए ताकि कांग्रेस के सामने वैसी स्तिथी ही उत्त्पन्त न हो कि उसे ऐआईयूडीऍफ़ का सहारा लेना पड़े. उधर मुस्लिम मतदात अपने नेता को उप मुख्य मंत्री की कुर्सी  पर देखने के लिए ऐआईयूडीऍफ़ को सराहा जिस के नतीजे में ऐईयूडीऍफ़ को 18 सीटें मिलीं थीं.

एक बार राजनेतिक समीकरण फिर वैसा ही बन रहा है. केवल मोहरे बदल रहे हैं.  2011 में मुस्लिम मतदाताओं ने ऐआईयूडीऍफ़ को सत्ता का भागीदार  बनाने के लिए वोट डाले थे लेकिन इस बार वह बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए वोट डालेंगे. अब ज़ाहिर है की बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस को मज़बूत करना होगा. मुस्लिम मतदाताओं के बीच तेज़ी से बदल रही इसी सोच के चलते ऐआईयूडीऍफ़ परेशान है . ज़ाहिर है कि जो सीटें ऐआईयूडीऍफ़ के हाथों से निकलेंगी वोह केवल और केवल कांग्रेस को मिलेंगी. ऐसी स्थिति में 2011 में खोई हुई सीटें कांग्रेस को दोबारा मिल सकती हैं. ऐसे में कांग्रेस सब से बड़ी पार्टी के रूप में उभर सकती है.

उधर बीजेपी का अपना वोट बैंक नहीं होने के कारण भी अधिकतर सीटों पर कांटे का टक्कर का सामना करना होगा. असम की जनता के बीच अपनी लोकप्रियता खो चुकी, सूखे पत्ते की तरह बेजेपी की झोली में आ गिरी ऐजीपी से समझौता करने से बीजेपी को फायदा कम और नुक्सान अधिक दिख रहा है. फिर बीजेपी में संगठन के अंदर चली आ रही राजनीती से उसे नुक्सान नहीं होगा, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है.  कुल मिला कर हिमंत विश्व शर्मा, सरबा नन्द सोनोवाल, और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, यह तीन नाम क्या बीजेपी को सत्ता तक पहुंचा पाएंगे यह एक बड़ा सवाल  है.

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