असम के 6 समुदायों के जनजातिकरण के खिलाफ संगोष्ठी

नई दिल्ली

शुक्रवार को “भारत में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के रूप में नए समुदायों का निर्धारण-समस्याएं, संभावनाएं और खतरा” पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। भारतीय संविधान सभा में आयोजित इस संगोष्ठी का उद्घाटन भारत सरकार के पूर्व वित्त मंत्री जेडी सीलम ने किया|

संगोष्ठी में असम और भारत सरकार द्वारा असम के छह उन्नत और जनसंख्या वाले ओबीसी समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के प्रस्ताव का विरोध करने का निर्णय लिया गया| यह छह ओबीसी समुदाय है – कोच राजवंशी, ताई-अहोम, चुतिया, मोरान, मटक और आदिवासी (चाय-जनजाति)| प्रस्ताव को असम के मौजूदा अनुसूचित जनजाति को नष्ट करने की साजिश करार दिया गया|

इस संदर्भ में सुहास चकमा ने कहा, एसटी के बारे में ऐतिहासिक रिकॉर्ड पहले से मौजूद हैं। यह एक बहुत ही जटिल मुद्दा है क्योंकि इसमें राजनीतिक शक्ति शामिल है। केवल आदिवासियों में ही एसटी की विशेषताएं हैं। यदि असमिया लोगों को एसटी घोषित किया गया तो असली अनुसूचित जनजातियों का क्या होगा? इसके गंभीर परिणाम होंगे| यह राजस्थान में मीना लोगों को एसटी का दर्जा देने की तरह होगा।

आब्सू के अध्यक्ष प्रमोद बोड़ो ने अपने संबोधन में कहा कि यह संगोष्ठी बहुत महत्वपूर्ण है। भारत और असम सराकार ने राजनीतिक प्रतिबद्धता दी है लेकिन इन सरकारों ने वास्तविक तथ्यों को नहीं समझा। इस मुद्दे के बारे में यह दूसरी बार संगोष्ठी आयोजित की गई है| उन्होंने कहा कि हमारा दृष्टिकोण कानूनी, संवैधानिक और समग्र है। हमारी एक संवैधानिक भाषा है| हम सरकारों को यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर आप उन्नत समुदायों के बारे में सोच रहे हैं तो पिछड़े हुए समुदायों के बारे में क्यों नहीं सोच रहे?

इधर आदित्य खाखलारी ने कहा कि “यह असम की मौजूदा अनुसूचित जनजातियों को नष्ट करने की साजिश है। अगर छह समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जाता है, तो यह ग्राम सभा, राज्य विधानसभाओं आदि में अनुसूचित जनजातियों के राजनैतिक प्रतिनिधित्व को समाप्त कर देगा।

भारत सरकार के पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई ने कहा कि यह समस्या विदेशियों के खिलाफ असम आंदोलन के परिणामस्वरूप आई ​​है। 1 9 85 में असम समझौते के तहत कहा गया है कि सरकार असम के स्वदेशी समुदायों को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करेगी। लेकिन स्वदेशी कौन हैं और कौन नहीं इसपर कोई आम सहमति नहीं है। अब 1 9 51, 1 9 71 की मतदाता सूची के आधार पर स्वदेशी समुदायों की पहचान की प्रक्रिया एनआरसी के माध्यम से हो रही है।

असम के छह समुदायों को “अनुसूचित जनजाति” दर्जा देने का विरोध करने के लिए संगोष्ठी ने सर्वसम्मति से संकल्प अपनाया।

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