असम विधान सभा चुनाव: छात्र संगठन आसू खामोश क्यों ?

गुवाहाटी

By- Rashmi Rekha Bhuyan

कांग्रेस के 15 साल के कुशासन को मुद्दा बनाकर इस बार बीजेपी असम विधानसभा चुनाव में भाग्य आजमा रही है। दिल्ली और बिहार में मिली करारी हार के बाद अब असम विधानसभा चुनाव जीतना बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है। ऐसे में परिवर्तन की उम्मीद जगाकर पार्टी जनता के द्वार पहुंची है।

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लेकिन पिछले कुछ समय में बीजेपी को असम में खास तौर से छात्र संगठन आसू के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है। आसू हमेशा यह आरोप लगाता आया है कि  2 साल के कार्यकाल में केंद्र की बीजेपी सरकार ने असम की जनता से किया हुआ एक भी वादा नहीं निभाया। केंद्र की एनडीए सरकार द्वारा हिन्दू बांग्लादेशियों को भारत की नागरिकता प्रदान किए जाने के फैसले के विरोध में आसू ने राज्य भर में प्रदर्शन भी किए। यहाँ तक कि सरकार की इस अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी। लेकिन रहस्यजनक ढंग से आज से कुछ समय पहले संगठन ने यह मामला वापस ले लिया। ऐसे में सवाल उठने लगे कि कहीं चुनाव से पूर्व आसू  बीजेपी की शरण में तो नहीं आ गया? आखिर छात्र संगठन आसू खामोश क्यों ?

आसू के 6 साल के असम आंदोलन के बाद 1985 में असम समझौते पर हस्ताक्षर हुआ था। 80 के दशक में असम से बांग्लादेशी बहिष्कार के उद्देश्य से एजीपी को जन्म देने वाला आसू हालांकि राज्य में बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व में एआईयूडीएफ के उत्थान से भी चिंतित है।

लेकिन सवाल यह है कि सब कुछ देखते हुए भी फिलहाल आसू खामोश क्यों है? खबर यह भी है कि आसू बीजेपी के सीएम पद के उम्मीदवार सर्वानंद सोनोवाल और अपने कुछ चहेते उम्मीदवारों की मदद भी कर रहा है। हालांकि आसू की यह चुप्पी एआईयूडीएफ का कद बढ़ा रही है।

आखिर वह क्या वजह है जिसने आसू को खामोश रहने पर मजबूर किया है? क्या आसू को अब असम से बांग्लादेशी बहिष्कार मुद्दे से कोई सरोकार नहीं या फिर आसू आज खुद बीजेपी की शरण में आकर उसकी मदद कर रहा है?

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