असम विधान सभा चुनाव : सरबानन्द और हिमंत कांग्रेस पर भारी पड़ेंगे ?

गुवाहाटी  

MANZAR ALAM-GUWAHATI-2By Manzar Alam            

इस बार असम में विधान सभा चुनाव खासा दिलचस्प होगा। इस बार बीजेपी नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव जीत कर असम में सरकार बनाना चाहती है क्योंकि पार्टी जानती है की अबकी नहीं तो फिर कभी नहीं । तो दूसरी ओर कांग्रेस पूरा जोर लगा कर चौथी बार सत्ता में वापस लौटने की कोशिश कर रही है। और इन दोनों के बीच की लड़ाई का फ़ाएदा उठाने की भर पूर कोशिश कर रही है बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऐआईयूडीऍफ़। ऐआईयूडीएफ़ जानती है की वोह अकेला सरकार नहीं बना सकती है, इस लिए उस का टार्गेट है की राज्य में बिना उसकी मदद के सरकार न बन पाए । वहीं कभी दो बार सत्ता में रह चुकी असम गण परिषद् के लिए यह चुनाव उस की अस्तित्व की लड़ाई लड़ने जैसा ही है । पार्टी में अब सिवा प्रफुल्ल कुमार महंत के कोई बड़ा नेता नहीं है, और पार्टी की लोकप्रियता में भी भारी कमी आयी है ।

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकेले 78 सीटें जीती थीं जबकि बीजेपी को सिर्फ पांच सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। इसके बाद बीजेपी ने राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए स्थानीय पार्टियों जैसे असम गण परिषद (एजीपी) और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) से गठजोड़ किया।

इस बार बीजेपी के पास दो बड़े नेता हैं, सरबानन्द सोनोवाल और हिमंत बिस्वा शर्मा, जिन के बारे ऐसा सोचा जा रहा है कि क्या यह दोनों कांग्रेस पर भारी पड़ सकते हैं ?। सरबानन्द की लोकप्रियता को देखते हुए बीजेपी उन्हें अपना मुख्य मंत्री पद का उमीदवार घोषित कर चुकी है, जिस का फ़ाएदा बीजेपी को मिल सकता है । दूसरी और हिमंत बिस्वा शर्मा है जिनकी राजनैतिक सूझ बूझ और दाव पेच का लोहा सभी मानते हैं । ऐसे में इन दोनों की राजनैतिक चाल कांग्रेस पर भारी पड़ सकती है ।

उधर कांग्रेस अपने 15 वर्षों की कारगुजारी गिनवा कर वोट मांग रही है । यह बात भी सही है तरुण गोगोई की सरकार ने विकास के बहुत काम किये हैं लेकिन इन विकास कार्यों के दम पर उन्हें किया बहुमत मिल पायेगी यह कहना मुश्किल है । कांग्रेस में जो दूसरे नेता है उन की लोकप्रियता इतना नहीं जितना की ज़रुरत है ।

कांग्रेस के पक्ष में सरकारी कर्मचारी ज़रूर नज़र आते हैं, जिन्हें गोगोई सरकार समय से तनखाह देती आ रही है । लेकिन मतदाताओं का एक बड़ा तबका बदलाव भी चाहता है । इस लिए कांग्रेस को अधिक नहीं थोड़ा नुक्सान उठाना पड़ सकता है । ऐसे में ज़ाहिर है कांग्रेस की सीट घटेगी।

बीजेपी के लिए सब से बड़ी मुश्किल पार्टी के भीतर है । पार्टी तीन खेमों में बंटी हुई दिखाई देती है । केन्द्रीय नेत्रित्व को भी इस का एहसास है लेकिन इस तोड़ का फिलहाल कोई जोड़ नज़र नहीं आता है । अगर यह तीन खेमों को एक साथ मिलाने में पार्टी कामयाब नहीं होती है तो पार्टी को इस का नुक्सान उठाना पड़ सकता है ।

बीजेपी के लिए एक और मुश्किल है, पार्टी के पास कोई चुनावी मुद्दा नहीं है । पार्टी केवल नरेन्द्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने की तैयारी करती नज़र आ रही है । प्रधान मंत्री के अलावा जितने भी केन्द्रीय नेता भाषण देने असम आ रहे हैं, उन्हें असम की राजनीती और यहाँ के मुद्दों की पूरी जानकारी नहीं होती है जिस के कारण उन का भाषण सत्य से परे हो जा ता है और वोह मतदाताओं को लुभाने में उतने सफल नहीं हो पा रहे हैं जितना होना चाहिय ।

अब अगर राजनेतिक पंडितों की बात करें तो उन का मानना है कि, इस चुनाव में किसी को भी बहुमत मिलता नज़र नहीं आ रहा है । कांग्रेस सब से बड़ी पार्टी बन का उभर सकती है, लेकिन सरकार बनाने के लिए उसे गठबंधन करना होगा । दूसरी सब से बड़ी पार्टी के रूप में बीजेपी उभर सकती है ।

बहर-ए-हाल चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद अब राज्य में चुनावी माहौल बनने लगा है, ऐसे में जो जितना जोर लगाएगा वोह उतना आगे बढ़ सकता है ।

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