अरुणाचल राजनीती संघर्ष- अब संविधान बेंच करेगा सुनवाई

नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश में चल रही राजनीतिक लड़ाई से जुड़ी याचिकाओं को संविधान बेंच के हवाले कर दिया है। ये याचिकाएं इस मामले में गुवाहाटी हाई कोर्ट की तरफ से जारी कुछ ऑर्डरों के मद्देनजर दायर की गई हैं। जस्टिस जे एस खेहर और सी नागप्पन की बेंच ने कहा कि ये मामले गवर्नर, स्पीकर और विधानसभा के उपाध्यक्ष के अधिकारों से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों के हैं, लिहाजा इन पर फैसले के लिए बड़ी बेंच की जरूरत है।

नेबाम रेबिया की तरफ से पेश हुए वकील ने सर्वोच्च अदालत की बेंच की इस राय से सहमति जताई कि इस मामले की सुनवाई पांच जजों की संवैधानिक बेंच द्वारा की जाना चाहिए। रेबिया को अरुणाचल प्रदेश के 14 बागी कांग्रेसी और बीजेपी विधायकों ने कथित तौर पर राज्य विधानसभा के स्पीकर पद से हटा दिया है।

सर्वोच्च अदालत की बेंच ने जैसे मामले को बड़ी बेंच के हवाले करने का फैसला सुनाया, इसके तुरंत बाद एफ. एस. नरीमन, कपिल सिब्बल और हरीश साल्वे समेत कई सीनियर वकील देश के चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर की अदालत में पहुंच गए और उनसे मामले पर सुनवाई के लिए तत्काल संविधान बेंच के गठन की मांग की।

इन वकीलों का कहना था कि यह मामला बेहद संवेदनशील है और इस पर जल्द से जल्द फैसला होना चाहिए। चीफ जस्टिस ने उन्हें इस मामले में जल्द फैसले का आश्वासन दिया। सर्वोच्च अदालत ने बुधवार को आदेश दिया था कि राज्य विधानसभा की कार्यवाही शुक्रवार तक शुरू ना हो।

बेंच ने रेबिया को हाई कोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस के प्रशासनिक ऑर्डर के खिलाफ दायर याचिका को भी वापस लेने की इजाजत दी थी। रेबिया ने आरोप लगाया था कि हाई कोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस ने ‘गलत तरीके’ से उनकी याचिका खारिज कर दी।

रेबिया ने अरुणाचल के गवर्नर और विधानसभा उपाध्यक्ष के कई फैसलों को गुवाहाटी हाई कोर्ट में चुनौती दी है, जिनमें उन्हें स्पीकर पद से हटाए जाने का मामला भी शामिल है। उन्होंने अपनी याचिका की सुनवाई से जस्टिस बी के शर्मा को अलग करने की मांग भी की थी।

रेबिया को कांग्रेस के 14 बागी विधायकों और BJP सदस्यों द्वारा स्पीकर के पद से हटाया गया था। विधानसभा उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में विधानसभा के सेशन 16 दिसंबर को रेबिया को हटाया गया था।

इससे पहले रेबिया ने बतौर स्पीकर कांग्रेस के इन विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी थी। इसके बाद गवर्नर और विधानसभा उपाध्यक्ष के कई फैसलों को उन्होंने गुवाहाटी हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसने अंतरिम ऑर्डर में गवर्नर और उपाध्यक्ष के सभी फैसलों पर एक फरवरी तक रोक लगा दी।

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