कान फिल्म महोत्सव में प्रदर्शित हुआ, 1962 : माई कंट्री लैंड

वेब डेस्क

जब भी लोग अरुणाचल प्रदेश के बारे में बातें करते हैं, तब 1962 के चीन-भारत युद्ध की कहानियों का जिक्र सबसे पहले होता है। यही कारण है कि अरुणाचल प्रदेश में जन्मे और असम के डिब्रूगढ़ में रह रहे चाउ पार्था बोरगोहाईं ने इस मुद्दे पर एक फिल्म ही बना डाला जिस का नाम है 1962 : माई कंट्री लैंड’ I युवा असमिया फिल्मकार की 1962 के भारत-चीन युद्ध पर बनी इस फिल्म को आज कान अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में प्रदर्शित किया गया।

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अंग्रेजी भाषा में बनी 108 मिनट लंबी फिल्म ‘1962 : माई कंट्री लैंड’ 28 वर्षीय चाउ पार्था बोरगोहाईं की पहली फिल्म है। लिविंग ड्रीम्स के बैनर तले बनी इस फिल्म के निर्माता मारबॉम माय हैं। बोरगोहाईं करीब ढाई करोड़ रुपए की लागत से बनी इस फिल्म के पटकथा लेखक और सिनेमेटोग्राफर भी हैं। फिल्म का संगीत मशहूर मणिपुरी लोक कलाकार गुरु रेवबेन माशंगवा ने शंक शंकीनी के साथ मिलकर तैयार किया है।

फिल्म की शूटिंग अरुणाचल प्रदेश के तवांग एवं मेचुका, मेघालय में सोहरा और गुवाहाटी में हुई है। अरुणाचल प्रदेश में जन्मे और अब असम के डिब्रूगढ़ में रह रहे बोरगोहाईं कहते हैं, ‘जब भी लोग अरुणाचल प्रदेश के बारे में बातें करते हैं, तब 1962 के चीन-भारत युद्ध की कहानियों का जिक्र सबसे पहले होता है। वहां रह रहे युद्ध प्रभावित स्थानीय लोगों के लिए 1962 के युद्ध की ये कहानियां अब भी नई हैं, भले ही कई अन्य उस दौरान लोगों द्वारा झेले गए दुख और यातना को भुला बैठे हों।’

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उनके मुताबिक आकाशवाणी पर जवाहर लाल नेहरू का दिया वह ऐतिहासिक बयान, ‘असम के लोगों के प्रति मेरे दिल में सहानुभूति है (अरुणाचल उस वक्त असम का ही हिस्सा था)।’ वाकई बेहद निराशाजनक था, क्योंकि मैं यही सोचता कि हमारे सर्वोच्च नेता ने कैसे इतनी जल्दी आत्मसमर्पण कर दिया।

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